संक्षिप्त उत्तर: चूड़ासमा क्षत्रिय राजवंश ने सौराष्ट्र में लगभग नौवीं-दसवीं शताब्दी से 1472 ई. तक शासन किया। उनकी प्रमुख राजधानियां वामनस्थली (आज का वनथली) और जूनागढ़ थीं। प्रारंभिक राजाओं—चूड़चंद्र, ग्रहरिपु, नवघण और खेंगार—का इतिहास साहित्य तथा लोकपरंपरा से मिलता है, इसलिए उनकी तिथियों में मतभेद हैं। 1294 ई. के आसपास मंडलिक प्रथम से आगे की वंशावली अभिलेखों के आधार पर अपेक्षाकृत स्पष्ट है और मंडलिक तृतीय तक पहुंचती है, जिन्हें 1472 ई. में महमूद बेगड़ा ने पराजित किया।
कालक्रम बनाना कठिन क्यों है?
चूड़ासमा इतिहास करीब छह शताब्दियों में फैला है, लेकिन हर शासक के समय का समकालीन शिलालेख उपलब्ध नहीं है। प्रारंभिक वंशावली भाट-परंपरा, जैन प्रबंध, संस्कृत काव्य और बाद के इतिहास-ग्रंथों में सुरक्षित रही। इन स्रोतों में नामों का क्रम और शासन-वर्ष हमेशा समान नहीं है। कई पीढ़ियों में नवघण, खेंगार, महीपाल और मंडलिक नाम दोहराए गए, जिससे भ्रम और बढ़ता है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों—जेम्स बर्गेस, जेम्स डब्ल्यू. वॉटसन, हेरॉल्ड विल्बरफोर्स-बेल और गौरीशंकर ओझा—ने उपलब्ध अभिलेखों और ग्रंथों की तुलना करके कालक्रम बनाने का प्रयास किया। प्रारंभिक सूची को अनुमान सहित पढ़ना चाहिए, जबकि बाद के शासकों के लिए तिथियां अधिक भरोसेमंद मानी जाती हैं।
राजवंश का उदय: चूड़चंद्र और वामनस्थली
परंपरागत वंशावली चूड़चंद्र या चंद्रचूड़ को चूड़ासमा वंश का संस्थापक बताती है और उनका काल लगभग 875 ई. से जोड़ा जाता है। दंधुसर अभिलेख में चूड़चंद्र को वंश-पूर्वज के रूप में याद किया गया है, लेकिन वह अभिलेख स्वयं बहुत बाद का है। इसलिए स्थापना-वर्ष को पूर्ण निश्चितता के बजाय परंपरागत काल-निर्धारण समझना चाहिए।
वामनस्थली, आज का वनथली, प्रारंभिक सत्ता-केंद्र था। गिरनार और जूनागढ़ के निकट स्थित यह क्षेत्र सौराष्ट्र के राजनीतिक मार्गों से जुड़ा था। बाद में जूनागढ़ और उपरकोट का पुनरुत्थान चूड़ासमा सत्ता की पहचान बन गया।
प्रारंभिक प्रमुख शासक
ग्रहरिपु
ग्रहरिपु को दसवीं शताब्दी का शक्तिशाली चूड़ासमा शासक माना जाता है। उनका संघर्ष अन्हिलवाड़ा के चालुक्य संस्थापक मूलराज से हुआ। हेमचंद्र जैसे जैन लेखकों के विवरण विरोधी दरबार की दृष्टि रखते हैं, इसलिए उनमें प्रयुक्त विशेषणों को निष्पक्ष जीवनी न माना जाए। फिर भी संघर्ष का उल्लेख बताता है कि सौराष्ट्र की चूड़ासमा शक्ति चालुक्यों के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती थी।
नवघण
चूड़ासमा इतिहास में नवघण नाम कई बार आता है। लोकपरंपरा एक नवघण को जूनागढ़ और उपरकोट के पुनरुद्धार से जोड़ती है। उनके नाम पर उपरकोट का प्रसिद्ध नवघण कुआं जाना जाता है। अलग-अलग सूचियों में नवघण की तिथि और क्रम बदलता है, इसलिए “नवघण प्रथम” जैसी संख्या उपयोग करने पर अपनाए गए इतिहासकार का उल्लेख करना चाहिए।
खेंगार
खेंगार नाम भी कई शासकों ने धारण किया। बारहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध रा खेंगार को जयसिंह सिद्धराज से संघर्ष और राणकदेवी की लोककथा से जोड़ा जाता है। चौदहवीं शताब्दी में 1331-1351 के आसपास शासन करने वाले खेंगार का नाम उत्तरकालीन अभिलेख-आधारित वंशावली में अलग मिलता है। दोनों को एक समझना गंभीर गलती है।
प्रारंभिक कालक्रम: सावधानी सहित
वॉटसन और विल्बरफोर्स-बेल जैसे इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत प्रारंभिक क्रम में सामान्यतः चूड़चंद्र, मूलराज, विश्ववराह, ग्रहरिपु, कवाट, द्यास, नवघण और खेंगार जैसे नाम आते हैं। इसके बाद भी नवघण और खेंगार नाम दोहरते हैं। इनकी सटीक आरंभ-अंत तिथियां विभिन्न पुस्तकों में अलग हैं।
इस सूची का उपयोग राजवंश की निरंतर स्मृति समझने के लिए किया जा सकता है, लेकिन हर वर्ष को शिलालेख से प्रमाणित न बताया जाए। विशेषकर 875 से तेरहवीं शताब्दी के बीच के काल में “लगभग”, “परंपरागत कालक्रम” और “इतिहासकारों के पुनर्निर्माण के अनुसार” जैसे शब्द आवश्यक हैं।
अभिलेख-आधारित उत्तरकालीन वंशावली
मंडलिक प्रथम से आगे का क्रम दंधुसर, रेवतीकुंड, गिरनार, वनथली और उपरकोट से जुड़े अभिलेखों की तुलना पर आधारित है। स्वीकार्य कालक्रम का संक्षिप्त रूप इस प्रकार है:
| शासक | अनुमानित शासनकाल | वंश-संबंध/टिप्पणी |
|---|---|---|
| मंडलिक प्रथम | 1294-1306 | यशोधवल के पुत्र माने जाते हैं |
| नवघण | 1306-1308 | मंडलिक प्रथम के पुत्र |
| महीपाल प्रथम | 1308-1331 | मंडलिक प्रथम के पुत्र; शासन अपेक्षाकृत लंबा |
| खेंगार | 1331-1351 | महीपाल प्रथम के पुत्र |
| जयसिंह प्रथम | 1351-1378 | खेंगार के पुत्र |
| महीपाल द्वितीय | 1378-1384 | जयसिंह प्रथम के पुत्र |
| मोकलसिंह/मुक्तसिंह | 1384-1396 | जयसिंह प्रथम के पुत्र; नाम की वर्तनी बदलती है |
| मंडलिक द्वितीय | 1396-1400 | मोकलसिंह के पुत्र |
| मेलिग/मेलक | 1400-1416 | मोकलसिंह के पुत्र |
| जयसिंह द्वितीय | 1416-1430 | मेलिग के पुत्र |
| महीपाल तृतीय | 1430-1451 | मेलिग के पुत्र |
| मंडलिक तृतीय | 1451-1472 | अंतिम स्वतंत्र चूड़ासमा शासक |
यह तालिका भी इतिहासकारों द्वारा अभिलेखों के समन्वय से तैयार की गई है। कुछ प्रकाशनों में एक-दो वर्ष और नाम-क्रम का अंतर मिल सकता है। इसलिए किसी शोध-लेख में मूल अभिलेख-संदर्भ देना सर्वोत्तम है।
मंडलिक प्रथम और अभिलेखीय स्पष्टता
मंडलिक प्रथम वह बिंदु हैं जहां से चूड़ासमा कालक्रम अपेक्षाकृत स्थिर हो जाता है। गिरनार के नेमिनाथ मंदिर और अन्य अभिलेख राजवंश के नामों को जोड़ने में सहायता करते हैं। इस समय दिल्ली सल्तनत का गुजरात पर दबाव बढ़ रहा था, जबकि सौराष्ट्र में स्थानीय राजसत्ता अपनी स्थिति बनाए हुए थी।
अभिलेख केवल युद्ध नहीं बताते; वे दान, मंदिर-कार्य, वंश-संबंध और राजकीय उपाधियां भी दर्ज करते हैं। इन्हीं छोटे संकेतों से इतिहासकार उत्तराधिकार का क्रम बनाते हैं।
महीपाल, खेंगार और जयसिंह की पीढ़ियां
चौदहवीं शताब्दी में महीपाल प्रथम, खेंगार और जयसिंह प्रथम के शासनकाल चूड़ासमा सत्ता की निरंतरता दिखाते हैं। गुजरात में अलग-अलग सल्तनती शक्तियों के दबाव और क्षेत्रीय संघर्षों के बावजूद राजवंश जूनागढ़-वनथली क्षेत्र में बना रहा। खेंगार के बाद जयसिंह का लंबा शासन इस निरंतरता का महत्वपूर्ण भाग है।
इसी काल के नाम बाद की लोकवंशावलियों में भी मिलते हैं, लेकिन अभिलेख उनके संबंधों को अधिक सुरक्षित आधार देते हैं। इसलिए राजाओं की सूची बनाते समय उत्तरकालीन नामों को प्रारंभिक लोककथा वाले समान नामों से अलग दिखाना चाहिए।
मंडलिक तृतीय: अंतिम स्वतंत्र शासक
मंडलिक तृतीय ने लगभग 1451 से 1472 ई. तक शासन किया। उनके समय गुजरात सल्तनत के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने जूनागढ़ पर अभियान किया। अंततः चूड़ासमा राज्य सल्तनत के अधीन हो गया। फारसी इतिहास, संस्कृत मंडलिक काव्य और स्थानीय स्मृति इस संक्रमण को अलग-अलग दृष्टि से बताते हैं।
मंडलिक तृतीय के साथ स्वतंत्र राजसत्ता समाप्त हुई, लेकिन चूड़ासमा वंश और उसकी शाखाएं समाप्त नहीं हुईं। बाद के स्थानीय जागीरदारों तथा राजपूत वंशावलियों में यह पहचान जीवित रही। राजनीतिक पराजय को किसी वंश के सामाजिक अंत के समान नहीं समझना चाहिए।
राजधानी: वनथली से जूनागढ़
चूड़ासमा सत्ता की दो मुख्य भौगोलिक धुरियां थीं—वनथली और जूनागढ़। वनथली प्रारंभिक राजकीय केंद्र रहा, जबकि जूनागढ़ का उपरकोट एक मजबूत दुर्ग और प्रतिष्ठित राजधानी बना। गिरनार पर्वत, धार्मिक केंद्र, जलस्रोत और व्यापारिक मार्ग जूनागढ़ को विशेष महत्व देते थे।
राजधानी का बदलाव हमेशा एक दिन में हुआ प्रशासनिक आदेश नहीं होता। कई बार राजा एक स्थल पर रहता है, सैन्य दुर्ग दूसरे स्थान पर सक्रिय रहता है और वंशावली पुराने केंद्र को भी प्रतिष्ठा देती रहती है। इसलिए दोनों शहरों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, चूड़ासमा राज्य के पूरक केंद्र समझना चाहिए।
चूड़ासमा राजाओं की विरासत
राजवंश की विरासत केवल राजाओं की सूची में सीमित नहीं है। उपरकोट का पुनरुत्थान, नवघण कुआं, गिरनार से जुड़े दान-अभिलेख, सौराष्ट्र की स्थानीय प्रशासनिक परंपरा और चालुक्य-सल्तनत शक्तियों के सामने लंबे प्रतिरोध ने चूड़ासमा पहचान को आकार दिया। खेंगार, नवघण और मंडलिक जैसे नाम आज भी गुजरात की सांस्कृतिक स्मृति में प्रतिष्ठित हैं।
खंगार क्षत्रिय वंश-परंपरा चूड़ासमा संबंध को महत्वपूर्ण मानती है। इस संबंध का अध्ययन नाम-समानता के साथ-साथ अभिलेख, प्रवासन-स्मृति, कुल-परंपरा और क्षेत्रीय इतिहास के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। प्रमाणपूर्ण अध्ययन क्षत्रिय गौरव को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे टिकाऊ आधार देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चूड़ासमा राजवंश ने कब शासन किया?
परंपरागत कालक्रम लगभग 875 ई. से आरंभ होता है और स्वतंत्र शासन 1472 ई. में मंडलिक तृतीय की पराजय तक माना जाता है। प्रारंभिक तिथियां अनुमानित हैं।
चूड़ासमा राजवंश की राजधानी क्या थी?
वामनस्थली/वनथली और जूनागढ़ इसके प्रमुख सत्ता-केंद्र थे। उपरकोट जूनागढ़ की दुर्गीय पहचान का केंद्र बना।
सबसे प्रसिद्ध चूड़ासमा राजा कौन थे?
ग्रहरिपु, नवघण, रा खेंगार और मंडलिक तृतीय विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। अलग-अलग खेंगार और नवघणों की पहचान उनके काल से करनी चाहिए।
सबसे विश्वसनीय कालक्रम कहां से शुरू होता है?
मंडलिक प्रथम, लगभग 1294 ई., से आगे की वंशावली अभिलेखों के कारण अपेक्षाकृत स्पष्ट मानी जाती है।
चूड़ासमा शासन कैसे समाप्त हुआ?
1472 ई. में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंडलिक तृतीय को पराजित कर राज्य को सल्तनत में मिला लिया। वंश और सामाजिक पहचान इसके बाद भी जारी रहे।
निष्कर्ष
चूड़ासमा राजवंश का इतिहास सौराष्ट्र की लंबी क्षत्रिय राजसत्ता, जूनागढ़ की रक्षा और बदलती राजनीतिक शक्तियों के बीच स्वाधीनता की कहानी है। प्रारंभिक राजाओं की स्मृति लोकसाहित्य में और उत्तरकालीन पीढ़ियों का क्रम अभिलेखों में सुरक्षित है। दोनों को सही सीमा के साथ पढ़ने पर चूड़चंद्र से मंडलिक तृतीय तक की यात्रा अधिक स्पष्ट होती है। नामों और तिथियों को बिना स्रोत मिलाए दोहराने के बजाय प्रमाणित तथा अनुमानित हिस्सों को अलग रखना ही इस गौरवशाली इतिहास के प्रति वास्तविक सम्मान है।
प्रमुख स्रोत
- James Burgess, Report on the Antiquities of Kathiawad and Kachh
- Gazetteer of the Bombay Presidency: Kathiawar, Volume VIII
- Harold Wilberforce-Bell, The History of Kathiawad from the Earliest Times
- D. B. Diskalkar, Chudasama inscriptions पर प्रकाशित शोध
- जूनागढ़ जिला प्रशासन
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
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