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जूनागढ़ का उपरकोट किला और चूड़ासमा राजवंश: प्राचीन दुर्ग से राजकीय राजधानी तक

1 मिनट Mahoba, Uttar Pradesh
जूनागढ़ के उपरकोट किले का प्रवेश और चूड़ासमा राजवंश की विरासत

उपरकोट किले का प्राचीन इतिहास, चूड़ासमा पुनरुद्धार, नवघण कुआं, अडी-कडी वाव, रा खेंगार और मंडलिक तृतीय का प्रमाणपूर्ण परिचय।

संक्षिप्त उत्तर: उपरकोट गुजरात के जूनागढ़ में गिरनार की तलहटी पर स्थित एक प्राचीन दुर्ग है। इसका आरंभ चूड़ासमा राजवंश से बहुत पहले के काल से जोड़ा जाता है, लेकिन मध्यकाल में चूड़ासमा शासकों ने इसे पुनर्जीवित कर जूनागढ़ की राजसत्ता और रक्षा का केंद्र बनाया। ग्रहरिपु और नवघण से जुड़ी पुनरुद्धार परंपराएं, नवघण कुआं, मजबूत परकोटे, बहुस्तरीय प्रवेश और मंडलिक तृतीय का अभिलेख—ये सभी उपरकोट और चूड़ासमा इतिहास के गहरे संबंध को दिखाते हैं। इसलिए इसे “केवल चूड़ासमाओं द्वारा शुरू से बनाया गया किला” कहना भी अधूरा है और उनके योगदान को नजरअंदाज करना भी।

उपरकोट किला कहां है?

उपरकोट जूनागढ़ शहर के पूर्वी हिस्से में गिरनार पर्वत की तलहटी के निकट स्थित है। “उपरकोट” का सामान्य अर्थ ऊंचे भाग पर स्थित किला समझा जाता है। इसकी ऊंची स्थिति से आसपास के क्षेत्र पर निगरानी और शहर की सुरक्षा में सहायता मिलती थी। आज यह गुजरात के महत्वपूर्ण विरासत स्थलों में गिना जाता है और इसके भीतर अलग-अलग युगों की संरचनाएं साथ दिखाई देती हैं।

दुर्ग का अध्ययन करते समय यह याद रखना चाहिए कि उपरकोट किसी एक राजा द्वारा एक ही समय में तैयार किया गया परिसर नहीं है। मौर्य-उत्तर प्राचीन अवशेष, बौद्ध गुफाएं, चूड़ासमा काल की जल और रक्षा संरचनाएं तथा सल्तनत काल के परिवर्तन एक ही परिसर में मिलते हैं। यही परतदार इतिहास इसे असाधारण बनाता है।

क्या उपरकोट चूड़ासमाओं से पहले मौजूद था?

जूनागढ़ क्षेत्र का इतिहास मौर्य काल तक जाता है। गिरनार के निकट अशोक के शिलालेख और प्राचीन बौद्ध गुफाएं इस भूभाग की पुरानी राजनीतिक तथा धार्मिक महत्ता का प्रमाण हैं। इतिहासकार उपरकोट के मूल दुर्गीय स्थल को प्राचीन काल से जोड़ते हैं। बाद में राजधानी और सत्ता-केंद्र बदलने पर यह स्थान लंबे समय तक उपेक्षित या वनाच्छादित रहा होगा।

चूड़ासमा परंपरा में किसी शासक द्वारा पुराने किले को फिर खोजने, जंगल साफ कराने और उसे आबाद करने की कथा मिलती है। अलग-अलग विवरण इस कार्य को ग्रहरिपु या नवघण से जोड़ते हैं। कथा का प्रत्येक प्रसंग प्रमाणित न हो, फिर भी इतना स्पष्ट है कि चूड़ासमा शासन ने उपरकोट और जूनागढ़ को मध्यकाल में नया राजनीतिक जीवन दिया।

चूड़ासमा राजवंश का जूनागढ़ आगमन

चूड़ासमा क्षत्रिय राजवंश का प्रारंभिक सत्ता-केंद्र वामनस्थली, आज का वनथली, माना जाता है। राजवंश की परंपरागत स्थापना नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में चूड़चंद्र से जोड़ी जाती है। प्रारंभिक तिथियां विवादित हैं, लेकिन दसवीं शताब्दी तक चूड़ासमा शक्ति का सौराष्ट्र में प्रभाव ऐतिहासिक स्रोतों में दिखाई देता है।

ग्रहरिपु का संघर्ष अन्हिलवाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज से हुआ। बाद की पीढ़ियों में नवघण और खेंगार जैसे शासकों ने जूनागढ़ की स्वतंत्रता की स्मृति को मजबूत किया। उपरकोट उनके लिए केवल सैनिक चौकी नहीं था; वह राजधानी, शरणस्थल, जल-सुरक्षा और राजकीय प्रतिष्ठा का संयुक्त केंद्र बन गया।

ग्रहरिपु, नवघण और किले का पुनरुद्धार

उपरकोट के पुनरुद्धार को लेकर दो प्रमुख नाम आते हैं। कुछ विवरण चूड़ासमा राजा ग्रहरिपु को किले के पुनर्निर्माण से जोड़ते हैं। लोककथा में कहा जाता है कि लंबे समय से वन में छिपे पुराने दुर्ग को फिर खोजा गया। दूसरे विवरण नवघण को जूनागढ़ लौटने और दुर्ग को पुनः सुदृढ़ करने वाला शासक बताते हैं।

यह अंतर प्राचीन और मध्यकालीन स्थलों में सामान्य है। “निर्माण”, “पुनर्निर्माण”, “पुनः खोज” और “राजधानी बनाना” चार अलग घटनाएं हो सकती हैं जिन्हें बाद की स्मृति एक कथा में मिला देती है। सबसे संतुलित निष्कर्ष है कि स्थल प्राचीन था और चूड़ासमा काल में उसका बड़े राजनीतिक केंद्र के रूप में पुनरुत्थान हुआ।

किले की रक्षा-वास्तुकला

उपरकोट की दीवारें कई हिस्सों में अत्यंत ऊंची और मजबूत हैं। मुख्य प्रवेश तक पहुंच बहुस्तरीय द्वारों से नियंत्रित होती है। एक के भीतर दूसरा द्वार आक्रमणकारी की गति कम करता और रक्षकों को अतिरिक्त नियंत्रण देता था। ऊंचा परकोटा, बुर्ज और सीमित पहुंच किसी लंबे घेरे का सामना करने के लिए आवश्यक थे।

आज दिखाई देने वाली हर दीवार एक ही काल की नहीं है। युद्ध, मरम्मत और बाद के शासकों ने परिसर को बदला। भीतरी द्वार के ऊपर बाद की इंडो-इस्लामिक स्थापत्य परत दिखाई देती है, जबकि अन्य हिस्से पुराने पत्थर के दुर्ग की प्रकृति रखते हैं। संरक्षण के लिए इन परतों को मिटाने के बजाय पहचानना जरूरी है।

नवघण कुआं: जल-सुरक्षा की अद्भुत योजना

उपरकोट के भीतर नवघण कुआं सबसे प्रसिद्ध संरचनाओं में है। यह सामान्य चौड़ी बावड़ी जैसा नहीं, बल्कि चट्टान में गहराई तक काटा गया कुआं है, जिसके साथ नीचे उतरने के लिए घुमावदार मार्ग बनाया गया। इसका नाम चूड़ासमा शासक नवघण से जुड़ा है।

घेराबंदी के समय किले के भीतर सुरक्षित पानी जीवन-मरण का प्रश्न होता था। बाहर के तालाब या नदी तक पहुंच कट सकती थी। चट्टान में गहरा जलस्रोत बनाना लंबे प्रतिरोध की क्षमता बढ़ाता था। कुएं की तिथि के बारे में अलग मत हो सकते हैं और संभव है कि विभिन्न चरणों में इसे गहरा या परिवर्तित किया गया हो, लेकिन चूड़ासमा राजकीय स्मृति से इसका नाम गहराई से जुड़ा है।

अडी-कडी वाव

अडी-कडी वाव भी उपरकोट की चर्चित जल संरचना है। यह चट्टान काटकर बनाई गई लंबी सीढ़ीदार व्यवस्था है। इसके नाम से जुड़ी दासियों अडी और कडी की कथा लोकप्रिय है, पर कथा को स्थापत्य की तिथि का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

वाव का वास्तविक महत्व उसकी इंजीनियरिंग में है। कठोर भूभाग में नीचे जलस्तर तक पहुंचने के लिए सीढ़ीदार मार्ग काटना श्रम और योजना की मांग करता था। नवघण कुआं और अडी-कडी वाव को साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि उपरकोट की रक्षा केवल दीवारों पर नहीं, विश्वसनीय जल-व्यवस्था पर भी टिकी थी।

बार-बार हुई घेराबंदियां

उपरकोट के बारे में लोकप्रिय विवरण कहते हैं कि उसने अनेक लंबी घेराबंदियां देखीं। सटीक संख्या अलग-अलग स्रोतों में बदलती है, इसलिए बिना प्रमाण कोई निश्चित आंकड़ा देना उचित नहीं है। फिर भी जूनागढ़ पर चालुक्य, दिल्ली सल्तनत और गुजरात सल्तनत के दबाव का इतिहास स्पष्ट है।

किले की ऊंची दीवारों और भीतरी जलस्रोतों ने उसे लंबे प्रतिरोध योग्य बनाया। चूड़ासमा शासकों के लिए यह सौराष्ट्र की स्वायत्तता का सैन्य आधार था। जब बाहरी शक्ति मैदानों या शहर के हिस्से पर नियंत्रण कर लेती, तब भी मजबूत दुर्ग संघर्ष को लंबा कर सकता था।

रा खेंगार और उपरकोट

लोकस्मृति में प्रसिद्ध रा खेंगार को जूनागढ़ तथा उपरकोट से जोड़ा जाता है। उनका संघर्ष चालुक्य राजा जयसिंह सिद्धराज से बताया जाता है। राणकदेवी की कथा इसी प्रसंग में लोकप्रिय हुई। राजनीतिक स्तर पर यह सौराष्ट्र की चूड़ासमा सत्ता और पाटन की चालुक्य शक्ति के बीच संघर्ष था।

चूड़ासमा वंश में खेंगार नाम कई बार आया, इसलिए सभी खेंगारों की घटनाओं को उपरकोट के एक ही काल में नहीं रखना चाहिए। रा खेंगार पर अलग लेख में प्रारंभिक लोकपरंपरा और चौदहवीं शताब्दी के अभिलेखित खेंगार के बीच अंतर समझाया गया है।

मंडलिक तृतीय का अभिलेख

उपरकोट के प्रवेश क्षेत्र में मंडलिक तृतीय से संबंधित पंद्रहवीं शताब्दी का अभिलेख महत्वपूर्ण है। मंडलिक तृतीय चूड़ासमा राजवंश के अंतिम स्वतंत्र शासक थे। उन्होंने लगभग 1451 से 1472 ई. तक शासन किया। अभिलेख राजवंश की उपस्थिति को सीधे स्मारक से जोड़ने वाला ठोस स्रोत है।

मंडलिक के काल में गुजरात सल्तनत के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने जूनागढ़ पर अभियान किया। 1472 ई. में चूड़ासमा राज्य सल्तनत के अधीन हो गया। इसके बाद किले में मस्जिद और अन्य स्थापत्य परिवर्तन हुए। आज का उपरकोट इस राजनीतिक संक्रमण को अपनी दीवारों में सुरक्षित रखता है।

बौद्ध गुफाएं और बहुस्तरीय विरासत

उपरकोट परिसर की बौद्ध गुफाएं चूड़ासमा काल से पहले की हैं। उन्हें चूड़ासमा निर्माण कहना गलत होगा। इसी तरह बाद के सल्तनत और नवाबी काल की तोपों या इमारतों को प्रारंभिक दुर्ग का हिस्सा नहीं माना जा सकता। हर संरचना को उसके संभावित काल में रखने से परिसर का इतिहास अधिक समृद्ध दिखाई देता है।

चूड़ासमा योगदान का महत्व इस बात में है कि उन्होंने प्राचीन दुर्ग को मध्यकालीन राजधानी और जीवित सत्ता-केंद्र बनाया। उन्होंने पुराने स्थल को अपनाया, उसकी रक्षा और जल संरचनाओं को उपयोगी बनाया तथा जूनागढ़ की पहचान से जोड़ दिया।

उपरकोट और गढ़कुंडर: स्मृति का संबंध

खंगार क्षत्रिय वंश-परंपरा चूड़ासमा संबंध को महत्वपूर्ण मानती है और जूनागढ़ से बुंदेलखंड तक की स्मृति को जोड़ती है। उपरकोट और गढ़कुंडर अलग भूगोल, अलग निर्माण-इतिहास और अलग राजनीतिक परिस्थितियों वाले किले हैं। उन्हें वास्तु की दृष्टि से एक जैसा कहना उचित नहीं होगा।

फिर भी दोनों दुर्ग क्षत्रिय राजसत्ता, पहाड़ी सुरक्षा, राजधानी और वंश-स्मृति के केंद्र हैं। इस संबंध पर शोध करते समय नामों की समानता के साथ शिलालेख, वंशावली, प्रवासन परंपरा और प्रकाशित इतिहास को भी साथ पढ़ना चाहिए।

आज उपरकोट देखते समय क्या पहचानें?

यात्री केवल फोटो खींचने के बजाय इन तत्वों पर ध्यान दे सकते हैं:

  • एक के भीतर एक बने प्रवेश-द्वार;
  • ऊंचे परकोटे और निगरानी बिंदु;
  • नवघण कुएं की चट्टान-कट जल योजना;
  • अडी-कडी वाव की सीढ़ीदार संरचना;
  • प्राचीन बौद्ध गुफाओं और मध्यकालीन दुर्ग के अलग काल;
  • मंडलिक तृतीय का अभिलेख;
  • सल्तनत और बाद के युगों की स्थापत्य परतें।

वर्तमान टिकट, समय और बंद हिस्सों की जानकारी गुजरात पर्यटन या स्थानीय प्रशासन से यात्रा वाले दिन जांचनी चाहिए। विरासत स्थल पर दीवारों को छूकर नुकसान, नाम लिखना या प्रतिबंधित हिस्से में जाना अनुचित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उपरकोट किला किसने बनवाया?

स्थल की शुरुआत प्राचीन काल से जुड़ी है और इसे किसी एक मध्यकालीन राजा का शून्य से बनाया किला नहीं कहा जा सकता। चूड़ासमा शासकों ने उपेक्षित प्राचीन दुर्ग को पुनर्जीवित कर राजधानी और रक्षा-केंद्र बनाया।

चूड़ासमा शासकों का उपरकोट से क्या संबंध था?

ग्रहरिपु और नवघण से पुनरुद्धार की परंपराएं जुड़ी हैं; बाद के चूड़ासमा राजा जूनागढ़ से शासन करते रहे। मंडलिक तृतीय का अभिलेख इस संबंध का ठोस प्रमाण है।

नवघण कुआं क्यों महत्वपूर्ण है?

यह चट्टान में गहराई तक काटा गया जलस्रोत है, जो घेराबंदी के समय किले को पानी उपलब्ध कराने की रणनीति दिखाता है। इसका नाम चूड़ासमा राजा नवघण से जुड़ा है।

उपरकोट में कौन-कौन से काल दिखाई देते हैं?

प्राचीन बौद्ध अवशेष, मध्यकालीन चूड़ासमा दुर्ग, गुजरात सल्तनत के परिवर्तन और बाद के नवाबी सैन्य अवशेष एक ही परिसर में मिलते हैं।

चूड़ासमा शासन कब समाप्त हुआ?

1472 ई. में महमूद बेगड़ा ने मंडलिक तृतीय को पराजित कर जूनागढ़ को गुजरात सल्तनत में मिला लिया।

निष्कर्ष

उपरकोट का महत्व इस बात में है कि उसने अनेक युगों को देखा, लेकिन चूड़ासमा क्षत्रिय राजवंश ने उसे मध्यकालीन जूनागढ़ की जीवित राजधानी और प्रतिरोध के दुर्ग में बदला। ग्रहरिपु-नवघण की पुनरुत्थान स्मृति, जल-सुरक्षा की उल्लेखनीय संरचनाएं, रा खेंगार की राजनीतिक परंपरा और मंडलिक तृतीय का अभिलेख इस संबंध को मजबूत करते हैं। प्राचीन, चूड़ासमा और सल्तनतकालीन परतों को अलग पहचानना किसी एक वंश का महत्व घटाना नहीं; यही उपरकोट की संपूर्ण और प्रमाणपूर्ण कहानी है।

आधिकारिक और शोध स्रोत

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