संक्षिप्त उत्तर: “रा खेंगार” केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है। चूड़ासमा राजवंश में खेंगार नाम के कई शासक हुए, इसलिए अलग-अलग कथाओं, युद्धों और तिथियों को एक ही राजा से जोड़ना ऐतिहासिक भ्रम पैदा करता है। लोकपरंपरा में सबसे प्रसिद्ध रा खेंगार वह शासक हैं जिनका संघर्ष गुजरात के चालुक्य राजा जयसिंह सिद्धराज से जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, 1331 से 1351 ई. के आसपास शासन करने वाले खेंगार का नाम अभिलेख-आधारित उत्तरकालीन चूड़ासमा वंशावली में अधिक स्पष्ट रूप से मिलता है। सही इतिहास समझने के लिए हर खेंगार की पहचान उसके काल, पिता, उत्तराधिकारी और उपलब्ध स्रोत के साथ करनी चाहिए।
“रा” और “खेंगार” नाम का अर्थ
सौराष्ट्र और जूनागढ़ की ऐतिहासिक परंपरा में “रा” या “रा’” शासकीय सम्मानसूचक संबोधन है। इसे राजा या स्थानीय अधिपति के अर्थ में समझा जा सकता है। “खेंगार” शासक का व्यक्तिगत नाम था, जो चूड़ासमा वंश में कई पीढ़ियों तक दोहराया गया। इसी कारण इतिहास की पुस्तकों में कभी खेंगार प्रथम, द्वितीय या बाद के क्रमांक मिलते हैं, जबकि लोकगीत केवल “रा खेंगार” कहते हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब किसी लोकप्रिय कथा का प्रसंग एक खेंगार से लिया जाए, तारीख किसी दूसरे खेंगार की लगा दी जाए और अभिलेख तीसरे शासक का प्रस्तुत कर दिया जाए। पाठक को सबसे पहले यह पूछना चाहिए—यह किस शताब्दी के रा खेंगार हैं? उनके समकालीन शासक कौन थे? जानकारी लोककथा से आई है या शिलालेख से?
चूड़ासमा राजवंश और जूनागढ़
चूड़ासमा क्षत्रिय राजवंश ने सौराष्ट्र के विभिन्न भागों पर लगभग नौवीं-दसवीं शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक शासन किया। उनकी सत्ता वामनस्थली, जिसे आज वनथली कहा जाता है, और जूनागढ़ से जुड़ी रही। प्रारंभिक इतिहास के नाम और तिथियां पूरी तरह निश्चित नहीं हैं, क्योंकि भाट-परंपराओं और बाद के ग्रंथों में अलग-अलग क्रम मिलता है। उत्तरकालीन शासकों के लिए अभिलेख, संस्कृत काव्य, जैन प्रबंध और फारसी इतिहास अधिक ठोस आधार देते हैं।
चूड़ासमा इतिहास की यही दोहरी प्रकृति—लोकस्मृति और अभिलेख—रा खेंगार के अध्ययन में भी दिखाई देती है। लोकगीत उनके साहस और संघर्ष को जीवित रखते हैं, जबकि इतिहासकार तिथि और घटनाक्रम तय करने के लिए समकालीन या निकटवर्ती स्रोत खोजते हैं। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, अलग प्रकार का साक्ष्य समझना चाहिए।
सिद्धराज जयसिंह से संघर्ष वाले रा खेंगार
गुजरात की सबसे चर्चित ऐतिहासिक-लोक कथाओं में रा खेंगार और चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज का संघर्ष आता है। जयसिंह सिद्धराज ने लगभग 1094 से 1143 ई. तक गुजरात पर शासन किया। इसलिए उनसे जुड़ा खेंगार भी बारहवीं शताब्दी के आरंभिक भाग में रखा जाता है। कई बाद के आख्यान इस संघर्ष को राणकदेवी की कथा से जोड़ते हैं।
इतिहासकारों के लिए युद्ध का व्यापक राजनीतिक संदर्भ अधिक स्पष्ट है: पाटन की चालुक्य सत्ता सौराष्ट्र पर अपना अधिकार मजबूत करना चाहती थी, जबकि जूनागढ़-वनथली के चूड़ासमा शासक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा कर रहे थे। व्यक्तिगत अपमान, विवाह और प्रतिशोध से जुड़ी कथा बाद के साहित्य और लोकस्मृति में विकसित हुई हो सकती है। इसलिए राणकदेवी प्रसंग को लोकपरंपरा के रूप में लिखना चाहिए, जबकि चालुक्य-चूड़ासमा प्रतिद्वंद्विता को राजनीतिक इतिहास के रूप में देखा जा सकता है।
राणकदेवी की कथा: इतिहास और लोकस्मृति
लोककथा में राणकदेवी को रा खेंगार की रानी बताया जाता है और जयसिंह सिद्धराज के आक्रमण को उनसे जोड़ा जाता है। कथाओं के संस्करण अलग हैं—जन्म, विवाह, युद्ध और अंतिम घटना का विवरण हर स्रोत में समान नहीं मिलता। पुरानी गुजराती काव्य-परंपरा, भाट आख्यान और आधुनिक नाटक-सिनेमा ने इस कथा को व्यापक लोकप्रियता दी।
इसका अर्थ यह नहीं कि लोकस्मृति महत्वहीन है। वह समाज की वीरता, नारी-सम्मान और राजनीतिक संघर्ष की सांस्कृतिक व्याख्या बताती है। लेकिन लेख में संवाद, निजी घटनाएं और निश्चित तारीखें तभी तथ्य के रूप में लिखी जानी चाहिए जब उनका स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध हो। सम्मानजनक और विश्वसनीय भाषा होगी—“लोकपरंपरा में यह कथा इस प्रकार कही जाती है।”
अभिलेखों में मिलने वाले बाद के खेंगार
चूड़ासमा वंश के उत्तरकालीन हिस्से की वंशावली प्रारंभिक काल की तुलना में अधिक स्पष्ट है। दंधुसर, रेवतीकुंड, गिरनार और जूनागढ़ से जुड़े अभिलेखों के आधार पर इतिहासकार मंडलिक प्रथम के बाद नवघण, महीपाल और खेंगार का क्रम प्रस्तुत करते हैं। इस खेंगार का शासन लगभग 1331 से 1351 ई. माना जाता है। उनके बाद जयसिंह प्रथम का नाम आता है।
यह खेंगार बारहवीं शताब्दी के सिद्धराज-विरोधी रा खेंगार से अलग हैं। दोनों के बीच लगभग दो शताब्दियों का अंतर है। इसलिए 1331-1351 की तारीख को राणकदेवी कथा वाले शासक पर लगाना गलत होगा। इसी प्रकार किसी अभिलेख में “खंगार” या “खेंगार” जैसी वर्तनी मिलने पर संदर्भ, लिपि और काल को देखे बिना आधुनिक वंश-निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
उपरकोट और जूनागढ़ की रक्षा परंपरा
जूनागढ़ का उपरकोट एक अत्यंत प्राचीन दुर्ग-स्थल है, जिसका उपयोग अनेक राजवंशों ने किया। चूड़ासमा काल में इसे सत्ता और सुरक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पुनर्जीवन मिला। लोकविवरण कभी ग्रहरिपु और कभी नवघण को दुर्ग के पुनरुद्धार से जोड़ते हैं। रा खेंगारों का राजनीतिक जीवन इसी जूनागढ़-केंद्रित दुर्गीय संसार में समझा जाना चाहिए।
किले पर शासन का अर्थ केवल महल में रहना नहीं था। उसमें गिरनार क्षेत्र के मार्ग, जलस्रोत, सैनिक चौकियां, व्यापार और धार्मिक प्रतिष्ठानों पर प्रभाव शामिल था। चूड़ासमा शासकों के संघर्षों का लक्ष्य सौराष्ट्र की राजनीतिक स्वायत्तता बचाना था। इसलिए रा खेंगार की वीर छवि किसी एक प्रेमकथा से बड़ी है; वह जूनागढ़ की स्वतंत्र राजसत्ता के प्रतिरोध का प्रतीक है।
रा खेंगार का ऐतिहासिक महत्व
रा खेंगार नाम तीन कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला, यह चूड़ासमा राजवंश की दीर्घकालीन परंपरा में बार-बार दिखाई देता है। दूसरा, सिद्धराज से संघर्ष की स्मृति गुजरात की लोकसंस्कृति में स्वतंत्रता और सम्मान के प्रतीक के रूप में जीवित रही। तीसरा, उत्तरकालीन अभिलेखों में खेंगार नाम मिलने से वंशावली को अधिक ठोस आधार मिलता है।
इन तीनों को जोड़ते समय सावधानी चाहिए। लोककथा भावनात्मक स्मृति देती है; अभिलेख नाम, संबंध और तिथि तय करने में मदद करता है; बाद का इतिहासलेखन दोनों की तुलना करता है। जब तीनों स्तर स्पष्ट रखे जाते हैं, तब रा खेंगार का गौरव अप्रमाणित अतिशयोक्ति पर निर्भर नहीं रहता।
खेंगार और खंगार नामों को कैसे समझें?
पुराने नाम अलग भाषाओं और लिपियों में बदलकर लिखे जाते रहे हैं। खेंगार, खंगार, खंगारा या Khangara जैसी वर्तनियां स्रोतों में मिल सकती हैं। केवल ध्वनि-समानता वंशगत समानता का अंतिम प्रमाण नहीं होती, लेकिन वह शोध का महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। खंगार क्षत्रिय परंपरा चूड़ासमा संबंध को अपने वंश-वृत्तांत में महत्वपूर्ण मानती है; इस विषय पर शिलालेख, वंशावलियां, प्रवासन-स्मृतियां और क्षेत्रीय इतिहास का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
सम्मानजनक इतिहासलेखन का अर्थ संबंध को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे स्पष्ट प्रमाणों के साथ मजबूत करना है। जहां अभिलेख उपलब्ध हों वहां उनका मूल पाठ, तिथि और प्रकाशन दिया जाए; जहां पारिवारिक परंपरा हो वहां उसे उसी रूप में दर्ज किया जाए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रा खेंगार कौन थे?
रा खेंगार चूड़ासमा राजवंश के शासकों द्वारा बार-बार धारण किया गया नाम है। सबसे प्रसिद्ध खेंगार को जयसिंह सिद्धराज से संघर्ष और राणकदेवी की लोककथा से जोड़ा जाता है।
क्या इतिहास में केवल एक रा खेंगार हुए?
नहीं। चूड़ासमा वंशावली में अलग-अलग कालों में कई खेंगार मिलते हैं। इसलिए हर घटना के साथ शताब्दी और स्रोत देखना जरूरी है।
रा खेंगार और राणकदेवी की कथा पूरी तरह प्रमाणित है?
चालुक्य-चूड़ासमा संघर्ष ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है, लेकिन राणकदेवी कथा के निजी प्रसंग अलग-अलग लोक और साहित्यिक संस्करणों में मिलते हैं। उन्हें लोकपरंपरा के रूप में प्रस्तुत करना उचित है।
1331-1351 वाले खेंगार कौन थे?
वे उत्तरकालीन चूड़ासमा वंशावली में महीपाल प्रथम के पुत्र और जयसिंह प्रथम के पूर्ववर्ती शासक माने जाते हैं। वे सिद्धराज से जुड़े शुरुआती खेंगार से अलग व्यक्ति थे।
रा खेंगार की राजधानी कहां थी?
चूड़ासमा सत्ता वनथली और जूनागढ़ से जुड़ी रही। प्रसिद्ध रा खेंगार की स्मृति विशेष रूप से जूनागढ़ और उपरकोट से जोड़ी जाती है।
निष्कर्ष
रा खेंगार चूड़ासमा क्षत्रिय इतिहास के साहस, स्वाधीनता और जूनागढ़ की रक्षा-स्मृति का प्रतिष्ठित नाम हैं। उनका सही परिचय तभी बनता है जब हम यह स्वीकार करें कि वंश में कई खेंगार हुए और अलग-अलग युगों की घटनाओं को एक राजा पर नहीं रखा जा सकता। सिद्धराज से संघर्ष वाले रा खेंगार, राणकदेवी की लोकस्मृति और अभिलेखों में दर्ज चौदहवीं शताब्दी के खेंगार—तीनों को उनके सही संदर्भ में रखने से इतिहास अधिक स्पष्ट और अधिक गौरवपूर्ण बनता है।
स्रोत
- James Burgess, Report on the Antiquities of Kathiawad and Kachh (Archaeological Survey of Western India)
- Gazetteer of the Bombay Presidency: Kathiawar, Volume VIII
- जूनागढ़ जिला प्रशासन
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
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