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मध्य प्रदेश में खंगार जाति की सरकारी श्रेणी कैसे बदली? खंगार क्षत्रिय इतिहास और वास्तविकता

1 मिनट Jhansi, Uttar Pradesh
गढ़कुंडार किले, खंगार क्षत्रिय योद्धा और ऐतिहासिक सरकारी अभिलेखों का प्रतीकात्मक चित्र

मध्य प्रदेश में खंगारों की सीमित क्षेत्रीय सरकारी प्रविष्टि 1936 से 1976 तक कैसे बदली और इसका खंगार क्षत्रिय इतिहास से क्या संबंध है—जानिए पूरा क्रम।

“मध्य प्रदेश में खंगार जाति किस श्रेणी में आती है?”, “खंगार जाति एससी में कब आई?” और “उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में खंगारों की सरकारी श्रेणी अलग क्यों है?”—इंटरनेट पर ये प्रश्न लगातार खोजे जा रहे हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर केवल आज की सरकारी सूची देखकर नहीं दिया जा सकता। इसके पीछे ब्रिटिशकालीन जनगणना, बुंदेलखंड की तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां, बदलती प्रांतीय सीमाएं और स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक निर्णय जुड़े हुए हैं।

लेकिन सबसे पहले एक बात पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए:

खंगार क्षत्रिय समाज का इतिहास किसी आधुनिक सरकारी सूची से प्रारंभ नहीं होता।

खंगार क्षत्रियों की पहचान बुंदेलखंड की धरती, गढ़कुंडार के राज्य, महाराजा खेतसिंह खंगार, दुर्गों की रक्षा, युद्ध-कौशल, स्वाभिमान और बलिदान की परंपराओं से जुड़ी है। सरकारी श्रेणियां बहुत बाद में बनीं। वे किसी समाज का वंश, रक्त, कुल, गोत्र या गौरवशाली इतिहास निर्धारित नहीं करतीं।

सरकारी सूची से सदियों पुराना है खंगार क्षत्रिय इतिहास

खंगार क्षत्रिय समाज का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास मध्यकालीन बुंदेलखंड तक जाता है। गढ़कुंडार खंगार सत्ता का प्रमुख केंद्र रहा। महाराजा खेतसिंह खंगार का नाम आज भी समाज के शौर्य, संगठन और स्वतंत्र सत्ता के प्रतीक के रूप में सम्मानपूर्वक लिया जाता है।

खंगारों की परंपरा केवल किसी पेशे या आधुनिक सरकारी पहचान तक सीमित नहीं रही। समुदाय ने अलग-अलग कालखंडों में सैनिक, दुर्ग-रक्षक, शासक, जमींदार, कृषक और स्थानीय नेतृत्वकर्ता की भूमिकाएं निभाईं।

गढ़कुंडार, जुझौतिखंड, झांसी, दतिया, चंदेरी, सागर और आसपास का क्षेत्र खंगार क्षत्रिय समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा हुआ है।

यही कारण है कि किसी बीसवीं शताब्दी की सरकारी सूची को आधार बनाकर खंगारों के सैकड़ों वर्ष पुराने क्षत्रिय इतिहास को नकारना न तो ऐतिहासिक रूप से उचित है और न तार्किक रूप से।

ब्रिटिश जनगणना से पहले “एससी” जैसी कोई पहचान नहीं थी

भारत में आधुनिक जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई। वर्ष 1881 में पहली बार पूरे देश में एक साथ जनगणना कराई गई। इन जनगणनाओं में ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय समाज को अपनी प्रशासनिक दृष्टि से समझने और अलग-अलग वर्गों में बांटने का प्रयास किया।

उस समय जातियों को कभी उनके पेशे, कभी स्थानीय सामाजिक स्थिति, कभी भूमि-स्वामित्व और कभी ब्रिटिश अधिकारियों की व्यक्तिगत समझ के आधार पर दर्ज किया गया।

एक ही समुदाय को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग नामों और अलग सामाजिक विवरणों के साथ लिखा गया। कई समुदायों ने जनगणना अधिकारियों को आवेदन देकर अपनी प्रचलित वंशीय पहचान सही प्रकार से दर्ज करने की मांग भी की।

इन शुरुआती जनगणनाओं में वर्तमान समय जैसी संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था नहीं थी। इसलिए जनगणना में किसी अधिकारी द्वारा लिखा गया विवरण किसी समुदाय की अंतिम ऐतिहासिक पहचान नहीं माना जा सकता।

ब्रिटिश अभिलेखों में भी मिलता है “छत्री खंगार”

यह उल्लेखनीय है कि 1931 के Central Provinces and Berar से संबंधित जनगणना अभिलेखों में “Chhatri Khangar” नाम को Khangar के साथ दर्ज किया गया।

उसी समय खंगार क्षत्रिय संस्थाओं द्वारा समुदाय की क्षत्रिय पहचान दर्ज कराने के प्रयासों के संकेत भी अभिलेखों में मिलते हैं।

इससे पता चलता है कि खंगार क्षत्रिय पहचान कोई आज गढ़ी गई नई धारणा नहीं है। समुदाय अपने वंश, परंपरा और सामाजिक पहचान को ब्रिटिश शासन के समय भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर रहा था।

औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा बनाई गई श्रेणियां और समुदाय की अपनी ऐतिहासिक पहचान हमेशा एक जैसी नहीं थीं। यही अंतर खंगार समाज के मामले में भी दिखाई देता है।

बुंदेलखंड, स्वाधीनता संघर्ष और खंगारों की वीर परंपरा

बुंदेलखंड विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष की भूमि रहा है। झांसी, दतिया, भांडेर और आसपास का पूरा क्षेत्र 1857 की क्रांति की गतिविधियों से प्रभावित रहा।

रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में झांसी का संघर्ष केवल किसी एक राजपरिवार की लड़ाई नहीं था। इसमें आसपास के गांवों, सैनिक समूहों, स्थानीय योद्धाओं और विभिन्न क्षत्रिय समुदायों ने भाग लिया।

खंगार समाज की स्मृतियों में भी 1857 का संघर्ष विशेष स्थान रखता है। झांसी क्षेत्र के वीर ठाकुर लम्पू सिंह खंगार को समाज अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष करने वाले योद्धा के रूप में याद करता है।

खंगार क्षत्रिय समाज के इस योगदान को विस्तार से पढ़ने के लिए वेबसाइट पर प्रकाशित ठाकुर लम्पू सिंह खंगार: 1857 के वीर योद्धा लेख देखा जा सकता है।

समाज की मौखिक परंपराओं में भांडेर और आसपास के खंगार परिवारों की ब्रिटिश-विरोधी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। इस इतिहास को गांवों के पुराने अभिलेखों, वंशावलियों, रियासती दस्तावेजों और स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित प्रमाणों के माध्यम से और अधिक संगठित करने की आवश्यकता है।

यह अवश्य समझना चाहिए कि वीरता और विद्रोह की यह परंपरा खंगार क्षत्रिय समाज के स्वाभिमान का हिस्सा है। लेकिन अभी उपलब्ध सरकारी आदेश यह नहीं बताते कि किसी क्षेत्र को केवल 1857 के विद्रोह के कारण किसी विशेष सरकारी श्रेणी में रखा गया था।

1931 के आसपास क्या बदल रहा था?

ब्रिटिश शासन के अंतिम दशकों में सरकार उन समुदायों की अलग-अलग सूचियां तैयार कर रही थी जिन्हें विशेष क्षेत्रों में सामाजिक, शैक्षिक या आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।

इन समुदायों के लिए उस समय सरकारी दस्तावेजों में “Depressed Classes” अर्थात वंचित वर्ग जैसा शब्द प्रयोग किया जाता था।

यह किसी व्यक्ति के कुल, वंश या वीरता का निर्णय नहीं था। यह ब्रिटिश प्रशासन द्वारा तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों को समझने के लिए बनाया गया वर्गीकरण था।

1921 के ग्वालियर जनगणना अभिलेख ने स्वयं स्वीकार किया था कि “Depressed Classes” कोई पारंपरिक हिन्दू सामाजिक नाम नहीं था। रिपोर्ट में अलग-अलग समुदायों को अवसरों की कमी, आर्थिक स्थिति और तत्कालीन सामाजिक सम्मान के आधार पर एक साथ रखने का प्रयास किया गया था।

इससे समझा जा सकता है कि उस दौर की सूची किसी जाति का प्राचीन परिचय नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रशासन का आकलन थी।

1936 में पहली सीमित सरकारी प्रविष्टि

Government of India Act, 1935 के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1936 में पहली औपचारिक प्रांतीय सूचियां जारी कीं।

खंगार नाम पूरे भारत, पूरे मध्य भारत या पूरे बुंदेलखंड के लिए दर्ज नहीं किया गया था। इसकी प्रविष्टि कुछ चुने हुए जिलों और तहसीलों तक सीमित थी।

यह क्षेत्रीय सीमा अपने आप में महत्वपूर्ण प्रमाण है।

यदि यह खंगार समाज की जन्मजात या प्राचीन पहचान का निर्धारण होता, तो वही स्थिति उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड की सभी रियासतों और खंगार आबादी वाले प्रत्येक क्षेत्र में समान होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

अर्थात यह निर्णय समुदाय के वंश के बारे में नहीं, बल्कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा कुछ क्षेत्रों में दर्ज की गई तत्कालीन परिस्थितियों से जुड़ा था।

स्वतंत्रता के बाद भी पुरानी क्षेत्रीय व्यवस्था जारी रही

भारत स्वतंत्र होने और संविधान लागू होने के बाद 1950 में नई सरकारी सूची जारी हुई। इसमें खंगार की पुरानी क्षेत्रीय प्रविष्टि तत्काल समाप्त नहीं की गई।

उस समय भी यह कुछ निश्चित जिलों और तहसीलों तक सीमित रही।

इससे एक विचित्र स्थिति बन गई थी—एक ही समाज के परिवार अलग-अलग जिलों में रहने के कारण अलग सरकारी श्रेणियों में गिने जा सकते थे। समाज, वंश, गोत्र और वैवाहिक संबंध समान होने के बावजूद प्रशासनिक अधिकार बदल जाते थे।

यही तथ्य सिद्ध करता है कि सरकारी श्रेणी और जातीय-वंशीय पहचान एक चीज नहीं हैं।

1956 में राज्यों की सीमाएं बदल गईं

वर्ष 1956 में भारत के राज्यों का बड़े स्तर पर पुनर्गठन हुआ।

नया मध्य प्रदेश पुराने मध्य प्रदेश, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल के क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया। दूसरी ओर भंडारा और बुलढाणा जैसे मराठी भाषी क्षेत्र मध्य प्रदेश से बाहर चले गए।

इस भौगोलिक बदलाव के बाद खंगार की पुरानी प्रविष्टि मध्य प्रदेश के भीतर मुख्य रूप से सागर तथा होशंगाबाद के निर्दिष्ट क्षेत्रों से संबंधित रह गई।

इसी काल में सरकारी नाम के साथ कनेरा और मिर्धा नाम भी जोड़े गए।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह परिवर्तन किसी नए ऐतिहासिक शोध से खंगारों का वंश तय करने के कारण नहीं हुआ। यह कानून, प्रशासन और राज्यों की बदलती सीमाओं से उत्पन्न परिवर्तन था।

एक ही समाज, लेकिन सरकारी सीमाएं अलग

बुंदेलखंड को आधुनिक राज्यों की सीमाओं ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच बांट दिया। लेकिन समाज की परंपराएं, रिश्तेदारी, गोत्र, विवाह संबंध और ऐतिहासिक स्मृतियां किसी राज्य सीमा पर समाप्त नहीं हुईं।

झांसी, ललितपुर, जालौन, दतिया, टीकमगढ़, निवाड़ी, छतरपुर और सागर के खंगार परिवार ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े रहे।

इसके बावजूद सरकारी सूचियां राज्य के अनुसार अलग बनीं।

इसलिए मध्य प्रदेश में बनी प्रशासनिक व्यवस्था को पूरे खंगार क्षत्रिय समाज की पहचान बताना अनुचित है। यदि सरकारी प्रविष्टि ही इतिहास और वंश का अंतिम प्रमाण होती, तो राज्य की सीमा पार करते ही किसी परिवार की जातीय उत्पत्ति बदल जाती—जो स्पष्ट रूप से असंभव है।

1960 के दशक में क्षेत्रीय सीमाओं पर पुनर्विचार

समय बीतने के साथ सरकार को पता चला कि जिला और तहसील आधारित पुरानी सूचियां कई कठिनाइयां पैदा कर रही थीं।

एक जिले में मिलने वाला लाभ दूसरे जिले में नहीं मिलता था। शिक्षा या रोजगार के लिए स्थान बदलने वाले परिवारों को समस्याओं का सामना करना पड़ता था।

सूचियों की समीक्षा करने वाली Lokur Committee ने माना कि पुराने क्षेत्रीय प्रतिबंध संभवतः दो कारणों से लगाए गए थे:

  • किसी क्षेत्र में तत्कालीन सामाजिक कठिनाइयां अधिक मानी गई हों;

  • अथवा उस समुदाय की उल्लेखनीय जनसंख्या केवल उन्हीं क्षेत्रों में दर्ज हुई हो।

समिति ने यह भी माना कि इस प्रकार की सीमाओं से एक ही समुदाय के लोगों के बीच प्रशासनिक अंतर पैदा हो रहा था।

इससे फिर वही बात सिद्ध होती है—ये व्यवस्थाएं स्थानीय परिस्थितियों और सरकारी प्रशासन से जुड़ी थीं, न कि खंगार क्षत्रिय समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति से।

1976 के बाद पूरे मध्य प्रदेश में व्यवस्था का विस्तार

वर्ष 1976 में संसद ने पुरानी सूचियों में व्यापक परिवर्तन करने वाला कानून पारित किया। इसमें अनेक समुदायों पर लगी जिला और तहसील की सीमाएं हटाई गईं।

मध्य प्रदेश की संशोधित सूची में “Khangar, Kanera, Mirdha” की प्रविष्टि बिना किसी जिले की सीमा के रखी गई। यह व्यवस्था 27 जुलाई 1977 से प्रभावी हुई।

इस परिवर्तन को ठीक प्रकार से समझना आवश्यक है।

यह खंगार समाज की नई जातीय उत्पत्ति की घोषणा नहीं थी। यह पुरानी क्षेत्रीय सरकारी व्यवस्था का पूरे राज्य में विस्तार था।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा:

कुछ क्षेत्रों में पहले से चली आ रही प्रशासनिक प्रविष्टि को 1976 के कानून के बाद पूरे मध्य प्रदेश में लागू कर दिया गया।

क्या खंगार समाज शुरू से इसी सरकारी श्रेणी में था?

नहीं।

वर्तमान संवैधानिक श्रेणियां प्राचीन भारत, मध्यकालीन बुंदेलखंड या खंगार राजवंश के समय अस्तित्व में ही नहीं थीं।

खंगार क्षत्रिय समाज का इतिहास इन श्रेणियों से बहुत पुराना है। आधुनिक सरकारी व्यवस्था को समुदाय के संपूर्ण इतिहास पर पीछे से लागू नहीं किया जा सकता।

सही ऐतिहासिक क्रम यह है:

  • पहले खंगार क्षत्रिय समाज का अपना राजवंशीय और योद्धा इतिहास था;

  • ब्रिटिश शासन ने भारतीय समुदायों का अपने ढंग से वर्गीकरण शुरू किया;

  • कुछ क्षेत्रों में खंगारों को तत्कालीन स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर विशेष सूची में रखा गया;

  • स्वतंत्रता के बाद पुरानी सूची कुछ समय तक क्षेत्रीय रूप में जारी रही;

  • बाद में जिले की सीमाएं हटाकर व्यवस्था पूरे मध्य प्रदेश में लागू की गई।

क्या सरकारी श्रेणी क्षत्रिय पहचान को नकारती है?

बिल्कुल नहीं।

किसी समुदाय की ऐतिहासिक पहचान उसके राजवंश, शासन, युद्धों, पुरालेखों, किलों, वंशावलियों, गोत्रों, लोकस्मृतियों और सामाजिक परंपराओं से समझी जाती है।

सरकारी आरक्षण संबंधी सूची प्रशासनिक सुविधा और संवैधानिक नीतियों से जुड़ी होती है।

दोनों को मिलाकर देखना इतिहास की गंभीर भूल होगी।

खंगार क्षत्रिय समाज की पहचान इन आधारों से जुड़ी है:

  • गढ़कुंडार का खंगार राज्य

  • महाराजा खेतसिंह खंगार की विरासत

  • जुझौतिखंड और बुंदेलखंड से ऐतिहासिक संबंध

  • दुर्ग-रक्षा और सैन्य परंपरा

  • क्षत्रिय गोत्र तथा वंश परंपराएं

  • विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष

  • 1857 में बुंदेलखंड के खंगार वीरों का योगदान

  • समाज की निरंतर चली आ रही क्षत्रिय चेतना

इन ऐतिहासिक आधारों को कोई बीसवीं शताब्दी की प्रशासनिक प्रविष्टि समाप्त नहीं कर सकती।

अलग-अलग राज्यों में अलग व्यवस्था क्या बताती है?

खंगार समाज मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में पाया जाता है। समुदाय का इतिहास और वंशीय संबंध राज्य सीमाओं से पुराने हैं, लेकिन सरकारी व्यवस्थाएं राज्यवार बनीं।

इसका सीधा अर्थ है कि सरकारी श्रेणी समुदाय की मूल पहचान नहीं, बल्कि राज्य से संबंधित प्रशासनिक निर्णय है।

एक ही गोत्र, एक ही कुल-परंपरा और आपस में वैवाहिक संबंध रखने वाले परिवारों को केवल राज्य सीमा के कारण अलग सरकारी श्रेणियों में गिना जाना इसी प्रशासनिक प्रकृति को प्रमाणित करता है।

इसलिए किसी एक राज्य की सूची उठाकर पूरे खंगार क्षत्रिय समाज के इतिहास पर टिप्पणी करना न उचित है और न प्रमाणिक।

खंगार क्षत्रिय समाज को अपना पक्ष कैसे रखना चाहिए?

समाज का पक्ष भावनाओं के साथ-साथ शुद्ध इतिहास पर आधारित होना चाहिए।

हमें यह नहीं कहना चाहिए कि सरकारी दस्तावेज मौजूद ही नहीं हैं। इसके बजाय हमें उनका सही अर्थ समझाना चाहिए:

  • ये दस्तावेज आधुनिक काल के हैं;

  • शुरुआती प्रविष्टियां केवल चुनिंदा क्षेत्रों में थीं;

  • राज्यों की सीमाएं बदलने से उनका प्रभाव बदला;

  • 1976 के बाद क्षेत्रीय व्यवस्था पूरे मध्य प्रदेश में फैली;

  • इससे खंगारों का प्राचीन क्षत्रिय इतिहास निर्धारित नहीं होता;

  • ब्रिटिश अभिलेखों में भी “छत्री खंगार” नाम मिलता है;

  • समुदाय की क्षत्रिय चेतना और वंश परंपरा लगातार विद्यमान रही है।

यही तर्क समाज के पक्ष को भावनात्मक होने के साथ प्रमाणिक और मजबूत भी बनाता है।

युवाओं के लिए संदेश

आज खंगार समाज के युवाओं की जिम्मेदारी है कि वे अपने इतिहास को पढ़ें, पुराने दस्तावेज सुरक्षित करें और बिना जांचे सोशल मीडिया दावों पर निर्भर न रहें।

अपने परिवार की वंशावली, गोत्र, मूल गांव, पुराने भूमि अभिलेख, रियासती दस्तावेज, स्वतंत्रता सेनानियों के प्रमाण और बुजुर्गों की मौखिक स्मृतियों को लिखित रूप में सुरक्षित करना चाहिए।

विशेष रूप से भांडेर, दतिया, झांसी और बुंदेलखंड में 1857 से जुड़े खंगार परिवारों के प्रमाणों को खोजने के लिए सामुदायिक शोध अभियान चलाया जा सकता है।

इससे समाज का पक्ष केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि दस्तावेजों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर सामने आएगा।

निष्कर्ष

मध्य प्रदेश में खंगार जाति की वर्तमान सरकारी श्रेणी को खंगार क्षत्रिय समाज का संपूर्ण इतिहास मानना गलत है।

खंगारों की सीमित क्षेत्रीय प्रविष्टि ब्रिटिशकालीन प्रशासन में कुछ जिलों और तहसीलों के लिए बनाई गई थी। राज्यों की सीमाएं बदलने के बाद उसका क्षेत्र भी बदल गया। वर्ष 1976 में पारित कानून और 1977 से लागू व्यवस्था ने उसे पूरे मध्य प्रदेश तक विस्तारित किया।

इन प्रशासनिक परिवर्तनों से न खंगारों का वंश बदला, न गोत्र बदले, न गढ़कुंडार का इतिहास मिटा और न महाराजा खेतसिंह खंगार की गौरवगाथा समाप्त हुई।

खंगार क्षत्रिय समाज की पहचान किसी सरकारी खाने से नहीं, बल्कि उसके इतिहास, शौर्य, राज्य-परंपरा, कुल-स्मृति और सदियों से चली आ रही क्षत्रिय चेतना से बनती है।

सरकारी सूचियां समय और सीमा के साथ बदल सकती हैं।

इतिहास, वंश और स्वाभिमान नहीं बदलते।

साक्ष्य एवं संदर्भ

इस लेख के प्रशासनिक और कानूनी इतिहास से जुड़े प्रमुख आधिकारिक अभिलेख:

  1. भारत सरकार (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1936 — ब्रिटिशकालीन प्रांतीय सूची और क्षेत्रीय सीमाओं का मूल सरकारी अभिलेख।

  2. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय: संवैधानिक आदेशों और संशोधन अधिनियमों का आधिकारिक संग्रह — 1950 तथा बाद के आदेशों के लिए।

  3. लोकुर समिति प्रतिवेदन — जातीय सूचियों की समीक्षा और क्षेत्रीय प्रतिबंधों पर सरकारी समिति का प्रतिवेदन।

  4. संसद डिजिटल पुस्तकालय: 1967 का संशोधन विधेयक अभिलेख — संसदीय विचार-विमर्श से संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड।

  5. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 — संशोधित राज्यवार सूचियों का केंद्रीय अधिनियम।

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