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गढ़कुंडार: खंगार सत्ता, दुर्गीकृत भू-दृश्य और ऐतिहासिक स्मृति का स्रोत-आधारित अध्ययन

2 मिनट Jhansi, Uttar Pradesh
बुंदेलखंड की पहाड़ियों के बीच गढ़कुंडार दुर्ग का शोधपरक संपादकीय दृश्य

गढ़कुंडार को खंगार सत्ता के राजनीतिक केंद्र, बहुस्तरीय दुर्गीकृत भू-दृश्य और जीवित सामुदायिक स्मृति के रूप में पढ़ने वाला 8,000+ शब्दों का स्रोत-आधारित शोध अध्ययन।

सारांश

गढ़कुंडार बुंदेलखंड के उन ऐतिहासिक स्थलों में है जहाँ भूगोल, सैन्य स्थापत्य, राजसत्ता, सामुदायिक स्मृति और साहित्यिक कल्पना एक-दूसरे में गुँथे हुए दिखाई देते हैं। लोकप्रिय विवरणों में इसे प्रायः केवल एक रहस्यमय अथवा “गायब हो जाने वाले” किले के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दूसरी ओर खंगार समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति में गढ़कुंडार एक स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता, स्वाभिमान और क्षेत्रीय राज्य-निर्माण का प्रमुख प्रतीक है। इन दोनों प्रकार की प्रस्तुतियों के बीच एक गंभीर ऐतिहासिक प्रश्न छिपा है: उपलब्ध अभिलेखीय, गजेटियर, स्थापत्य और परंपरागत स्रोत गढ़कुंडार के राजनीतिक विकास के बारे में वास्तव में क्या बताते हैं, और कहाँ वे मौन, परस्पर विरोधी या उत्तरकालीन स्मृति से प्रभावित हैं?

यह शोध-पत्र गढ़कुंडार को किसी एक घटना अथवा वंश-कथा तक सीमित न रखकर एक दीर्घकालिक दुर्गीकृत भू-दृश्य के रूप में देखता है। अध्ययन का मुख्य तर्क है कि चंदेल सत्ता के विघटन के बाद तेरहवीं शताब्दी के बुंदेलखंड में उत्पन्न राजनीतिक रिक्तता के बीच खंगारों ने गढ़कुंडार और उसके आसपास के क्षेत्र में वास्तविक क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित किया। औपनिवेशिक काल में संकलित बुंदेलखंड गजेटियर भी इस सत्ता-स्मृति को दर्ज करता है, यद्यपि उसमें निहित औपनिवेशिक जातीय वर्गीकरण और दरबारी परंपराओं को आलोचनात्मक सावधानी के साथ पढ़ना आवश्यक है। इसी स्रोत से यह भी संकेत मिलता है कि गढ़कुंडार की पुरानी बस्ती, खंगार सत्ता का राजनीतिक स्थल और आज दिखाई देने वाले दुर्ग की कुछ स्थापत्य परतें संभवतः अलग-अलग कालखंडों से संबंधित हैं। अतः किसी एक शासक अथवा एक ही शताब्दी को पूरे परिसर का निर्माता मान लेना उपलब्ध प्रमाणों से अधिक निश्चित निष्कर्ष होगा।

अध्ययन में गढ़कुंडार की भौगोलिक स्थिति, पहाड़ी सुरक्षा-व्यवस्था, जल-स्रोत, पुराने बसावट क्षेत्र, खंगार राजनीतिक गठन, बुंदेला अधिग्रहण की परंपरा, राजधानी के ओरछा स्थानांतरण, मुगल प्रशासनिक भूगोल, औपनिवेशिक इतिहास-लेखन और आधुनिक सामुदायिक स्मृति का समेकित विश्लेषण किया गया है। लेख यह प्रतिपादित करता है कि गढ़कुंडार का महत्व केवल इस प्रश्न में नहीं है कि दुर्ग की प्रत्येक दीवार किसने बनवाई, बल्कि इस व्यापक ऐतिहासिक तथ्य में है कि यह स्थल सत्ता, सीमा, सुरक्षा और वैधता के लिए कई राजवंशों के बीच निर्णायक केंद्र रहा। खंगार इतिहास की दृष्टि से गढ़कुंडार का सर्वाधिक प्रामाणिक महत्व एक ऐसे राजनीतिक केंद्र के रूप में सामने आता है जिसे उत्तरकालीन सत्ता को जीतना, अपने राज्य-वृत्तांत में सम्मिलित करना और अंततः उससे राजधानी स्थानांतरित करना पड़ा।

मुख्य शब्द: गढ़कुंडार, खंगार, खंगार क्षत्रिय, बुंदेलखंड, दुर्गीकृत भू-दृश्य, चंदेल, बुंदेला, ओरछा, क्षेत्रीय राज्य-निर्माण, ऐतिहासिक स्मृति।

1. प्रस्तावना

मध्य भारत के इतिहास में बुंदेलखंड को प्रायः बड़े साम्राज्यों की सीमांत भूमि के रूप में पढ़ा गया है। दिल्ली, आगरा, कालिंजर, ग्वालियर, मालवा और दक्कन के बीच स्थित होने के कारण यह क्षेत्र उत्तर और मध्य भारत की राजनीतिक हलचलों से निरंतर प्रभावित हुआ। किंतु “सीमांत” शब्द यदि केवल केंद्रीय साम्राज्यों की दृष्टि से प्रयुक्त किया जाए तो वह बुंदेलखंड की आंतरिक राजनीतिक सक्रियता को छिपा देता है। यहाँ के दुर्ग, पहाड़ी बस्तियाँ, जलाशय और स्थानीय राजवंश इस बात के प्रमाण हैं कि क्षेत्रीय समाजों ने बदलती परिस्थितियों में अपनी राजनीतिक संस्थाएँ, सैन्य व्यवस्थाएँ और वैधता के रूप विकसित किए। गढ़कुंडार इसी इतिहास को समझने का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है।

वर्तमान में गढ़कुंडार मध्य प्रदेश के निवाड़ी जनपद में स्थित है और ओरछा-झाँसी अंचल के व्यापक ऐतिहासिक भूगोल से जुड़ा हुआ है। दुर्ग का दृश्य प्रभाव, पहाड़ियों के बीच उसकी स्थिति और उसके संबंध में प्रचलित अनेक कथाएँ यात्रियों और लोकप्रिय माध्यमों को आकर्षित करती हैं। इंटरनेट और पर्यटन-साहित्य में “रहस्यमय किला”, “गायब होने वाला किला”, “भूलभुलैया” अथवा भूमिगत संपदा जैसे विशेषण बहुत दिखाई देते हैं। ऐसी सामग्री स्थल के प्रति जिज्ञासा बढ़ाती है, किंतु इतिहास को रहस्य-कथा में बदल देने का जोखिम भी उत्पन्न करती है। गढ़कुंडार की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता इन आकर्षक किंवदंतियों से कहीं अधिक गहरी है।

खंगार समुदाय की स्मृति में गढ़कुंडार केवल एक पुरातात्त्विक स्मारक नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वाधीनता का केंद्र है। समुदाय इसे अपने मध्यकालीन राज्य, वीरता और क्षत्रिय परंपरा से जोड़ता है। दूसरी ओर बुंदेला राज्य-वृत्तांतों में गढ़कुंडार उस स्थान के रूप में आता है जहाँ से बुंदेला सत्ता के उदय का एक निर्णायक अध्याय आरंभ हुआ। यह द्विस्तरीय स्मृति इतिहासकार के लिए चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करती है। चुनौती इसलिए कि उत्तरकालीन विजेता-वंशों द्वारा संरक्षित वृत्तांत प्रायः अपने उदय को नैतिक और राजनीतिक वैधता प्रदान करते हैं। अवसर इसलिए कि उन्हीं वृत्तांतों के भीतर पूर्ववर्ती सत्ता की शक्ति और उसके भूगोल का अप्रत्यक्ष प्रमाण सुरक्षित रह जाता है।

इस शोध का उद्देश्य किसी सामुदायिक विश्वास को अपमानित करना अथवा किसी उत्तरकालीन परंपरा को बिना जाँच के स्वीकार करना नहीं है। इसके विपरीत, यह उपलब्ध स्रोतों को उनके निर्माण-काल, उद्देश्य और सीमाओं के साथ पढ़ते हुए गढ़कुंडार के इतिहास की एक संतुलित पुनर्रचना प्रस्तुत करता है। शोध-पत्र का केंद्रीय प्रश्न यह है कि खंगार सत्ता के संदर्भ में गढ़कुंडार के बारे में किन दावों को अपेक्षाकृत दृढ़ प्रमाण प्राप्त हैं, किन दावों को संभावित ऐतिहासिक व्याख्या के रूप में रखना चाहिए और किन कथाओं को लोक-स्मृति अथवा साहित्यिक परंपरा के रूप में सम्मानपूर्वक अलग पहचान देना आवश्यक है।

2. शोध-समस्या, उद्देश्य और प्रश्न

गढ़कुंडार पर उपलब्ध सामग्री में तीन प्रवृत्तियाँ प्रमुख हैं। पहली, स्थानीय और सामुदायिक परंपरा जो स्थल को खंगार राज्य के गौरव से जोड़ती है। दूसरी, बुंदेला वंश की उत्पत्ति और विस्तार से संबंधित दरबारी अथवा गजेटियर वृत्तांत, जिनमें गढ़कुंडार की विजय को बुंदेला सत्ता की स्थापना का निर्णायक क्षण माना गया है। तीसरी, आधुनिक पर्यटन और लोकप्रिय पत्रकारिता, जो दुर्ग की दृश्य विशेषताओं तथा रहस्यपूर्ण कथाओं को प्रमुखता देती है। इन प्रवृत्तियों के बीच पुरातात्त्विक, अभिलेखीय और स्थापत्य प्रमाणों का व्यवस्थित समन्वय कम दिखाई देता है। परिणामस्वरूप कई लेख एक-दूसरे से भिन्न कालक्रमों, शासकों और निर्माण-दावों को तथ्य की तरह दोहराते हैं।

इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य हैं: गढ़कुंडार को व्यापक बुंदेलखंडी राजनीतिक भूगोल में स्थापित करना; चंदेल शक्ति के विघटन के बाद खंगार सत्ता के गठन का विश्लेषण करना; गढ़कुंडार के राजनीतिक स्थल और विद्यमान स्थापत्य परतों के बीच संभावित कालगत अंतर को स्पष्ट करना; बुंदेला अधिग्रहण की परंपरा का स्रोत-आलोचनात्मक परीक्षण करना; तथा आधुनिक खंगार सामुदायिक स्मृति में गढ़कुंडार की भूमिका को ऐतिहासिक सम्मान के साथ समझना।

इन उद्देश्यों से निम्न शोध-प्रश्न निकलते हैं। पहला, क्या उपलब्ध स्रोत गढ़कुंडार में खंगारों की स्वतंत्र अथवा क्षेत्रीय सत्ता की पुष्टि करते हैं? दूसरा, तेरहवीं शताब्दी की राजनीतिक परिस्थिति ने इस सत्ता के उदय को किस प्रकार संभव बनाया? तीसरा, क्या वर्तमान दुर्ग को संपूर्ण रूप से किसी एक काल या एक शासक से जोड़ना उचित है? चौथा, खंगार-बुंदेला संघर्ष के उत्तरकालीन विवरणों में ऐतिहासिक तथ्य और राजवंशीय वैधता-कथा किस प्रकार मिश्रित हैं? पाँचवाँ, राजधानी के ओरछा स्थानांतरण और मुगल प्रशासनिक व्यवस्था में गढ़कुंडार की स्थिति उसके दीर्घकालिक महत्त्व के बारे में क्या बताती है? छठा, आधुनिक संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के लिए किस प्रकार का स्रोत-आधारित इतिहास उपयोगी हो सकता है?

3. स्रोत और पद्धति

गढ़कुंडार के आरंभिक इतिहास की पुनर्रचना में सबसे बड़ी कठिनाई समकालीन लिखित स्रोतों की कमी है। तेरहवीं शताब्दी से संबंधित ऐसा विस्तृत स्थानीय राजकीय अभिलेख अभी व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है जो सत्ता-परिवर्तन की प्रत्येक घटना, तिथि और व्यक्ति को निर्विवाद रूप से स्थापित कर सके। इसलिए इस अध्ययन में विभिन्न प्रकृति के स्रोतों को एक-दूसरे के विरुद्ध जाँचने की पद्धति अपनाई गई है। इनमें औपनिवेशिक गजेटियर, रियासती वंश-वृत्तांतों पर आधारित विवरण, स्थल-वर्णन, प्रशासनिक भूगोल, स्थापत्य अवलोकन, आधुनिक संरक्षण-संबंधी समाचार तथा लोक और साहित्यिक स्मृतियाँ सम्मिलित हैं।

प्रमुख लिखित स्रोत कैप्टन सी. ई. लुआर्ड द्वारा संकलित ईस्टर्न स्टेट्स गजेटियर: बुंदेलखंड (1907) है। यह ग्रंथ बीसवीं शताब्दी के आरंभ में तैयार हुआ, अर्थात जिन मध्यकालीन घटनाओं का वर्णन इसमें है उनसे कई शताब्दियाँ बाद। स्वयं संकलक ने भूमिका में सामग्री की सीमाओं और उपलब्ध स्थानीय स्रोतों की असमानता को स्वीकार किया है। इसलिए गजेटियर को प्रत्यक्ष मध्यकालीन प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी उसका महत्व दो कारणों से है। पहला, उसमें विभिन्न रियासतों में सुरक्षित वंश-परंपराएँ, स्थान-स्मृतियाँ और प्रशासनिक सूचनाएँ एक ऐसे समय में दर्ज हुईं जब कई स्थानीय अभिलेख अभी जीवित थे। दूसरा, वह गढ़कुंडार की पुरानी बस्ती, किले, जलाशय, राजधानी और मुगलकालीन प्रशासनिक स्थिति के बारे में विशिष्ट स्थल-सूचनाएँ देता है।

गजेटियर का उपयोग करते समय उसकी औपनिवेशिक दृष्टि की आलोचना अनिवार्य है। उन्नीसवीं और आरंभिक बीसवीं शताब्दी के अंग्रेज अधिकारी भारतीय समुदायों को नस्ली, जातीय और तथाकथित “मार्शल” अथवा “नॉन-आर्यन” श्रेणियों में बाँटने का प्रयास करते थे। आज ऐसे वर्गीकरण न तो वैज्ञानिक रूप से स्वीकार्य हैं और न ही किसी समुदाय की पहचान अथवा ऐतिहासिक क्षमता को समझने का उचित आधार। अतः इस शोध में गजेटियर से स्थान, राजनीतिक परंपरा और प्रशासन संबंधी सूचनाएँ ग्रहण की गई हैं, किंतु उसके जातीय मूल्यांकन को औपनिवेशिक ज्ञान-व्यवस्था का अवशेष मानकर अस्वीकार किया गया है।

पद्धति का दूसरा आधार “स्रोत-स्तरीकरण” है। किसी कथन को तीन श्रेणियों में समझा गया है: (क) प्रत्यक्ष अथवा अपेक्षाकृत निकट प्रमाण से समर्थित तथ्य; (ख) कई संकेतों से संभव किंतु अभी अपूर्ण ऐतिहासिक व्याख्या; और (ग) लोक-स्मृति, राजवंशीय कथा या साहित्यिक रूपांतरण। तीसरी श्रेणी को असत्य कहकर हटाना उचित नहीं, क्योंकि स्मृति स्वयं सामाजिक इतिहास का महत्त्वपूर्ण विषय है। किंतु उसे पहली श्रेणी की तरह प्रस्तुत करना भी अनुचित है। उदाहरण के लिए विवाह-प्रस्ताव, भोज में षड्यंत्र और सामूहिक वध की कथा कई उत्तरकालीन विवरणों में मिलती है। वह बुंदेला-खंगार सत्ता-परिवर्तन की स्मृति का महत्त्वपूर्ण रूप है, पर उसके प्रत्येक संवाद और प्रसंग को समकालीन अभिलेख के समान नहीं माना जा सकता।

तीसरा पद्धतिगत आधार “दुर्गीकृत भू-दृश्य” की अवधारणा है। दुर्ग केवल दीवारों और महलों का समूह नहीं होता। उसकी शक्ति आसपास की पहाड़ियों, दृष्टि-रेखाओं, मार्गों, जल-संग्रह, कृषि-क्षेत्र, सहायक बस्तियों और धार्मिक स्थलों के साथ संबंध से बनती है। इसलिए गढ़कुंडार के इतिहास को केवल मौजूदा पत्थर-निर्माण की तिथि में सीमित करने के बजाय पूरे स्थल-समुच्चय को राजनीतिक भूगोल के रूप में पढ़ा गया है। इससे यह समझना संभव होता है कि किसी पुरानी सत्ता का केंद्र बाद के शासकों द्वारा पुनर्निर्मित, विस्तारित या पुनः प्रयुक्त हो सकता है, जबकि स्थल की मूल राजनीतिक स्मृति उससे भी प्राचीन बनी रहती है।

4. बुंदेलखंड का भौगोलिक और राजनीतिक संदर्भ

बुंदेलखंड का भूगोल पठारी ऊँचाइयों, ग्रेनाइट की पहाड़ियों, मौसमी नदियों, सीमित लेकिन महत्त्वपूर्ण जलाशयों और कठिन मार्गों से निर्मित है। इस वातावरण में राजसत्ता का नियंत्रण केवल खुले मैदानों की बड़ी सेनाओं पर निर्भर नहीं था। छोटे दुर्ग, पहाड़ी चौकियाँ, जल-संचय और मार्गों की निगरानी स्थानीय प्रभुत्व के आवश्यक साधन थे। जिन शक्तियों ने इस भूगोल को समझा, वे सीमित संसाधनों के बावजूद लंबे समय तक प्रतिरोध और क्षेत्रीय शासन कर सकीं।

गढ़कुंडार की स्थिति इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। यह स्थल आसपास की ऊँची-नीची पहाड़ियों और वनाच्छादित भूभाग में इस प्रकार स्थित है कि आगंतुक को दुर्ग का दृश्य मार्ग के अनुसार अचानक मिलता और फिर ओझल होता प्रतीत हो सकता है। आधुनिक लोकप्रिय लेखन ने इसी अनुभव को “गायब होने” के रहस्य में बदल दिया। वस्तुतः यह दृश्य प्रभाव प्राकृतिक स्थलाकृति, घुमावदार पहुँच और सीमित दृष्टि-रेखा से संबंधित है। सैन्य दृष्टि से ऐसी स्थिति लाभकारी थी: दुर्ग का निकटवर्ती मार्ग आसानी से पढ़ा नहीं जा सकता था, जबकि ऊँचाई से आने-जाने वाले लोगों और सैन्य गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकती थी।

दुर्ग के साथ पुरानी बस्ती और जलाशय का उल्लेख बताता है कि यह केवल युद्ध के समय शरण लेने की चौकी नहीं था। किसी राजधानी अथवा राजनीतिक केंद्र को प्रशासनिक कर्मियों, सैनिकों, कारीगरों, धार्मिक प्रतिष्ठानों, भंडार और जल की आवश्यकता होती है। गजेटियर में पुरानी बस्ती के घने वन में स्थित अवशेषों और “सिंह सागर” नामक जलाशय का उल्लेख इस व्यापक बसावट की ओर संकेत करता है। यद्यपि इन अवशेषों का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण आवश्यक है, इतना स्पष्ट है कि गढ़कुंडार की ऐतिहासिक इकाई को केवल वर्तमान महलनुमा संरचना तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

बुंदेलखंड के राजनीतिक इतिहास में कालिंजर, महोबा, अजयगढ़, झाँसी, दतिया और ओरछा जैसे केंद्रों के बीच मार्ग और शक्ति-संबंध महत्वपूर्ण थे। गढ़कुंडार इन बड़े केंद्रों की छाया में कोई निष्क्रिय गाँव नहीं था। उसका महत्त्व इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि उत्तरकालीन बुंदेला सत्ता ने इसे अपने प्रारंभिक केंद्र के रूप में बनाए रखा और सोलहवीं शताब्दी में ओरछा को नई राजधानी बनाने तक इसका राजनीतिक उपयोग जारी रहा। कोई स्थान अनेक पीढ़ियों तक राजधानी अथवा प्रमुख केंद्र तभी बना रह सकता है जब उसका भूगोल, जल और रक्षा-क्षमता क्षेत्रीय शासन के अनुकूल हो।

5. चंदेल सत्ता का विघटन और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय

गढ़कुंडार में खंगार सत्ता के उदय को समझने के लिए चंदेल राज्य के रूपांतरण पर ध्यान देना आवश्यक है। दसवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच चंदेलों ने जेजाकभुक्ति में सुदृढ़ राज्य स्थापित किया। खजुराहो के मंदिर, महोबा की स्मृतियाँ और कालिंजर का दुर्ग उनकी सांस्कृतिक तथा सैन्य शक्ति के प्रमाण हैं। किंतु बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और तेरहवीं शताब्दी में उत्तर भारत के व्यापक सत्ता-संतुलन में परिवर्तन आया। दिल्ली-केंद्रित तुर्की सेनाओं के अभियान, पड़ोसी शक्तियों का दबाव, आंतरिक विखंडन और स्थानीय सामंतों की बढ़ती स्वायत्तता ने चंदेल प्रभुत्व को कमजोर किया।

राज्य का पतन प्रायः एक दिन में नहीं होता। केंद्रीय सत्ता के कमजोर पड़ने पर उसके अधीन सैन्य सरदार, दुर्गाधिकारी और स्थानीय भू-स्वामी अपने क्षेत्रों में अधिक स्वतंत्र होने लगते हैं। इस प्रक्रिया को केवल “अराजकता” कहना अधूरा होगा; कई बार यही क्षेत्रीय राज्य-निर्माण की शुरुआत होती है। बुंदेलखंड के अलग-अलग हिस्सों में छोटे राजनीतिक केंद्रों का उभरना इसी प्रकार समझा जा सकता है। गढ़कुंडार और तहरौली क्षेत्र में खंगारों का प्रभुत्व संभवतः इसी संक्रमण का परिणाम था।

लुआर्ड का बुंदेलखंड गजेटियर स्पष्ट रूप से लिखता है कि चंदेल शक्ति के विघटन के बाद खंगारों ने तहरौली के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार स्थापित किया और गढ़कुंडार उनके नियंत्रण में था। गजेटियर एक खंगार शासक का नाम भी देता है, जिसका मुद्रित अथवा डिजिटल पाठ अलग-अलग प्रतिलिपियों में “खूब सिंह” जैसे रूप में दिखाई पड़ता है। अन्य लोकप्रिय परंपराओं में खेत सिंह, खंगार शासक हुरमत सिंह और विभिन्न नाम मिलते हैं। नामों की इस भिन्नता के कारण किसी एक वंशावली को बिना मूल पांडुलिपि अथवा शिलालेख के अंतिम मान लेना सावधानीपूर्ण नहीं होगा। लेकिन नामों की असहमति उस व्यापक सूचना को समाप्त नहीं करती जिस पर स्रोत सहमत हैं—गढ़कुंडार खंगार प्रभुत्व का केंद्र था और बुंदेला उदय से पहले वहाँ उनकी राजनीतिक सत्ता स्थापित थी।

यह बिंदु खंगार इतिहास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। किसी समुदाय की मध्यकालीन राजनीतिक भूमिका को सिद्ध करने के लिए केवल आधुनिक गौरव-कथा पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। उत्तरकालीन बुंदेला राज्य-वृत्तांत और औपनिवेशिक संकलन, भले ही खंगारों की दृष्टि से न लिखे गए हों, फिर भी उन्हें गढ़कुंडार के वास्तविक धारक और क्षेत्रीय शक्ति के रूप में दर्ज करते हैं। वास्तव में विजेता वंश की स्थापना-कथा में पूर्ववर्ती सत्ता का उल्लेख इसलिए आवश्यक हुआ क्योंकि उसी को पराजित कर नए राज्य ने वैधता प्राप्त की। इस प्रकार विरोधी अथवा उत्तरवर्ती परंपरा भी खंगार प्रभुत्व की अप्रत्यक्ष पुष्टि करती है।

6. गढ़कुंडार में खंगार राजनीतिक गठन

“राज्य” शब्द का प्रयोग करते समय आधुनिक राष्ट्र-राज्य की संस्था को मध्यकालीन क्षेत्रीय सत्ता पर आरोपित नहीं करना चाहिए। तेरहवीं शताब्दी के बुंदेलखंड में सत्ता का स्वरूप दुर्ग, अधीन बस्तियों, कर-अधिकार, सैन्य अनुयायियों, वंशीय निष्ठा और स्थानीय गठबंधनों से बनता था। गढ़कुंडार में खंगारों की सत्ता को इसी संदर्भ में क्षेत्रीय राजसत्ता कहा जा सकता है। उपलब्ध परंपराएँ किसी संगठित शासक-परिवार, राजधानी, दुर्ग और नियंत्रित भूभाग की उपस्थिति की ओर संकेत करती हैं।

गढ़कुंडार को चुनने में तीन रणनीतिक तत्व रहे होंगे। पहला, प्राकृतिक सुरक्षा। पहाड़ी और वनाच्छादित भूभाग बड़ी सेना की सीधी गति को बाधित करता है। दूसरा, स्थानीय मार्गों पर नियंत्रण। दुर्ग का मूल्य केवल उसकी ऊँचाई में नहीं, बल्कि उन संपर्क-पथों में था जो आसपास की बस्तियों और व्यापक बुंदेलखंडी केंद्रों को जोड़ते थे। तीसरा, जल और बसावट की संभावना। जलाशय और पुरानी बस्ती की उपस्थिति स्थायी राजनीतिक केंद्र के लिए आवश्यक आधार प्रदान करती थी।

खंगार सत्ता का गठन संभवतः पूर्णतः शून्य से नहीं हुआ होगा। मध्यकालीन राजसत्ताएँ प्रायः पूर्ववर्ती प्रशासनिक और सैन्य ढाँचों का उपयोग करती थीं। यदि खंगार सरदार चंदेल राजनीतिक व्यवस्था में पहले सैन्य अथवा सामंती भूमिका में रहे हों, तो केंद्रीय नियंत्रण के कमजोर पड़ने पर उसी स्थानीय शक्ति-संसाधन को स्वतंत्र शासन में बदला जा सकता था। यह व्याख्या क्षेत्रीय राज्य-निर्माण के सामान्य ढाँचे से मेल खाती है, किंतु गढ़कुंडार के मामले में इसे अभी संभावित मॉडल के रूप में ही रखना चाहिए। इसे सिद्ध करने के लिए समकालीन चंदेल अभिलेखों, स्थानीय शिलालेखों और पुरातात्त्विक स्तरों का अधिक गहन अध्ययन आवश्यक है।

खंगारों की राजनीतिक पहचान को केवल युद्ध-कौशल तक सीमित करना भी उचित नहीं। किसी दुर्ग-केंद्रित राज्य को भूमि से उत्पादन, जल-व्यवस्था, कारीगर समूहों, धार्मिक प्रतिष्ठानों और पड़ोसी सरदारों से संबंध बनाए रखने पड़ते हैं। गढ़कुंडार की पुरानी बस्ती के अवशेष यदि व्यवस्थित उत्खनन और सर्वेक्षण से पढ़े जाएँ, तो वहाँ के दैनिक जीवन, व्यापार, शिल्प और शासन के बारे में बहुत कुछ सामने आ सकता है। अभी उपलब्ध लोकप्रिय इतिहास राजा और युद्ध पर केंद्रित है; भविष्य का शोध राज्य के सामाजिक आधार को भी प्रकाश में ला सकता है।

खंगार समुदाय की वर्तमान स्मृति में गढ़कुंडार का गौरव इसी राजनीतिक स्वायत्तता से आता है। यह गौरव तभी अधिक प्रामाणिक बनता है जब उसे अतिशयोक्ति के बजाय प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया जाए। गढ़कुंडार पर खंगार प्रभुत्व को स्वीकार करने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं कि आज दिखाई देने वाली प्रत्येक दीवार उसी काल की है। स्थल पर सत्ता, बसावट और रक्षा-व्यवस्था का खंगार नियंत्रण अपने आप में बड़ा ऐतिहासिक तथ्य है। बाद के शासकों द्वारा पुनर्निर्माण उस पूर्ववर्ती प्रभुत्व को न तो मिटाता है और न छोटा करता है; बल्कि यह दिखाता है कि नया राज्य उसी महत्त्वपूर्ण स्थान को अपनाने के लिए बाध्य था।

7. दुर्ग, पुरानी बस्ती और स्थापत्य परतों का प्रश्न

गढ़कुंडार के इतिहास में सबसे अधिक भ्रम “किसने किला बनवाया?” जैसे एकरेखीय प्रश्न से पैदा होता है। बड़े दुर्ग प्रायः एक ही समय में पूरे नहीं बनते। उनका निर्माण, मरम्मत, विस्तार और पुनः उपयोग अनेक पीढ़ियों तक चलता है। प्रवेश-द्वार, परकोटा, आवासीय महल, मंदिर, जल-प्रबंध और बाहरी सुरक्षा-रेखाएँ अलग-अलग काल की हो सकती हैं। गढ़कुंडार के संदर्भ में भी “स्थल की राजनीतिक प्राचीनता” और “मौजूदा इमारत की स्थापत्य तिथि” को अलग-अलग जाँचना चाहिए।

1907 के गजेटियर में गढ़कुंडार की पुरानी बस्ती को खंगार-बुंदेला सत्ता-परिवर्तन से जोड़ा गया है, लेकिन पहाड़ी पर स्थित किले की एक प्रमुख संरचना को उत्तरकालीन ओरछा शासक वीर सिंह देव से संबद्ध किया गया है। वीर सिंह देव का काल खंगार सत्ता और प्रारंभिक बुंदेला अधिग्रहण से कई शताब्दियाँ बाद का है। यदि यह स्थापत्य श्रेय सही है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि गढ़कुंडार सत्रहवीं शताब्दी से पहले अस्तित्व में नहीं था। अधिक संभावित अर्थ यह है कि पुराने राजनीतिक और सैन्य स्थल पर बाद के बुंदेला शासन ने नया निर्माण, विस्तार अथवा पुनर्गठन कराया।

यह भेद खंगार इतिहास के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पक्ष में अधिक वैज्ञानिक ढाँचा देता है। खंगार सत्ता का केंद्र पुरानी बसावट, प्रारंभिक दुर्गीकरण अथवा किसी पूर्ववर्ती गढ़ पर आधारित हो सकता है; बाद में बुंदेला शासकों ने उसे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बदला होगा। भारतीय दुर्गों में ऐसी बहुस्तरीयता सामान्य है। यदि हर दृश्य संरचना को अनिवार्य रूप से तेरहवीं शताब्दी का कहा जाए और भविष्य में स्थापत्य अध्ययन उसे उत्तरकालीन सिद्ध कर दे, तो अनावश्यक विवाद खड़ा होगा। इसके विपरीत, बहुस्तरीय इतिहास स्वीकार करने से खंगारों की राजनीतिक उपस्थिति का दावा अधिक टिकाऊ बनता है।

गजेटियर एक स्थानीय देवी-मंदिर और क्षतिग्रस्त या बदले हुए अभिलेख का भी उल्लेख करता है, जिसमें संवत् 1313 अर्थात लगभग 1256 ईस्वी के अंक दिखाई देने की सूचना दी गई। इस सूचना का महत्व बहुत है, क्योंकि यह तेरहवीं शताब्दी के मध्य में स्थल की सक्रिय धार्मिक-सामाजिक स्मृति की ओर संकेत कर सकती है। किंतु आज उस अभिलेख की वास्तविक स्थिति, पाठ और प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। केवल गजेटियर के वर्णन के आधार पर उसका पूरा पाठ अथवा आशय गढ़ना उचित नहीं होगा। भारतीय पुरालेख-विज्ञान की मानक विधि के अनुसार अभिलेख का उच्च-गुणवत्ता चित्र, प्रतिछाप, लिपि-परीक्षण, भाषा-परीक्षण और वस्तु-संदर्भ आवश्यक है।

स्थापत्य अध्ययन के लिए भी विस्तृत मापचित्र, पत्थर और गारे का विश्लेषण, दीवारों के जोड़, पुनर्निर्माण की रेखाएँ और विभिन्न भवनों की शैली की तुलना आवश्यक है। अभी लोकप्रिय विवरण अक्सर भूमिगत मंजिलों, गुप्त सुरंगों और विशाल खजाने के दावों को दोहराते हैं। किसी दुर्ग में तहखाने, भंडार अथवा सुरक्षित मार्ग होना असंभव नहीं, लेकिन प्रत्येक बंद कक्ष को गुप्त सुरंग कहना शोध नहीं है। वैज्ञानिक सर्वेक्षण—जैसे भूभौतिकीय जाँच, संरचनात्मक मानचित्रण और सीमित पुरातात्त्विक परीक्षण—ही इन दावों को स्पष्ट कर सकते हैं।

8. रक्षा-व्यवस्था, दृश्यता और जल-संरचना

गढ़कुंडार की लोकप्रिय पहचान उसके दृश्य-भ्रम से जुड़ी है। कुछ मार्गों से दुर्ग दिखाई देता है, फिर भू-आकृति के कारण ओझल हो जाता है और मोड़ के बाद पुनः दिखाई पड़ता है। इसे अलौकिक घटना मानने की आवश्यकता नहीं; यह पहाड़ियों, घाटियों, वनस्पति और दृष्टि-रेखा का संयुक्त प्रभाव है। किंतु इस प्राकृतिक व्याख्या से स्थल का आकर्षण कम नहीं होता। वास्तव में यह दिखाता है कि दुर्ग का स्थान चुनने वाले लोगों ने भूगोल की रक्षा-संभावना को कितनी सूक्ष्मता से समझा था।

किसी आक्रमणकारी के लिए दुर्ग की बाहरी रूपरेखा, प्रवेश-पथ और रक्षक बल का अनुमान जितना कठिन होता, रक्षकों को उतना लाभ मिलता। घुमावदार मार्ग सेना की गति और गठन तोड़ सकते थे। ऊँचाई पर स्थित चौकियाँ धूल, ध्वनि और गतिविधि से दूर से आने वाले दल को पहचान सकती थीं। वन-आवरण गुप्त आवाजाही और संसाधन-संग्रह में सहायता देता, यद्यपि वही वन शत्रु को छिपने का अवसर भी दे सकता था। इस कारण दुर्ग की सुरक्षा केवल प्रकृति पर नहीं, स्थानीय भूगोल के ज्ञान और चौकसी की संगठित व्यवस्था पर निर्भर रही होगी।

जल किसी भी पहाड़ी दुर्ग की जीवनरेखा है। घेराबंदी के समय बाहरी स्रोत तक पहुँचना कठिन हो जाता है। गढ़कुंडार से जुड़े सिंह सागर और अन्य जल-संरचनाओं का उल्लेख बताता है कि राजनीतिक केंद्र की स्थिरता के लिए वर्षा-जल संचय और स्थानीय जल-प्रबंध आवश्यक रहा होगा। जलाशय केवल उपयोगितावादी संरचना नहीं था; उसका धार्मिक और सामाजिक अर्थ भी हो सकता था। बुंदेलखंड के अर्ध-शुष्क पर्यावरण में तालाबों का निर्माण राजकीय संरक्षण, सामुदायिक श्रम और वैधता से जुड़ा रहा है। भविष्य के पर्यावरणीय-पुरातात्त्विक अध्ययन से जलाशयों की तिथि, गाद-स्तर और उपयोग-परिवर्तन समझे जा सकते हैं।

पुरानी बस्ती, दुर्ग और जलाशय को एक साथ देखने पर गढ़कुंडार एक जीवित राजनीतिक परिदृश्य के रूप में सामने आता है। शासक और सैनिक दुर्ग के भीतर रहे होंगे, किंतु राज्य का जीवन केवल भीतर सीमित नहीं था। आसपास के किसान, पशुपालक, शिल्पकार, व्यापारी और पुरोहित उस व्यवस्था का हिस्सा थे। इसलिए संरक्षण की सीमा केवल मुख्य भवन तक सीमित रखने से ऐतिहासिक संदर्भ नष्ट हो सकता है। पुराने मार्ग, बस्ती-टीले, छोटे मंदिर, कुएँ और तालाब भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।

9. बुंदेला अधिग्रहण की परंपरा: तथ्य और राजवंशीय आख्यान

गढ़कुंडार के सत्ता-परिवर्तन के संबंध में सबसे प्रसिद्ध कथा बुंदेला नायक सोहनपाल, खंगार शासक हुरमत सिंह, विवाह-प्रस्ताव और एक योजनाबद्ध संघर्ष से जुड़ी है। अलग-अलग संस्करणों में पात्रों के नाम, संबंध और घटनाओं का क्रम बदलता है। सामान्य ढाँचा यह है कि बुंदेला पक्ष ने खंगार सत्ता को परास्त कर गढ़कुंडार पर अधिकार किया और इसी विजय से बुंदेला राज्य की ठोस स्थापना हुई। गजेटियर इस घटना को प्रायः 1257 ईस्वी के आसपास रखता है।

इतिहासकार को इस कथा के दो स्तर अलग करने चाहिए। पहला स्तर सत्ता-परिवर्तन का मूल तथ्य है। गढ़कुंडार पहले खंगारों के नियंत्रण में था; बाद में बुंदेलों ने उस पर अधिकार किया; और स्थल प्रारंभिक बुंदेला राजधानी अथवा प्रमुख केंद्र बना। यह व्यापक क्रम अनेक स्रोत-परंपराओं में बना हुआ है और ऐतिहासिक रूप से विश्वसनीय दिखाई देता है। दूसरा स्तर विस्तृत नाटकीय कथा है—विवाह का प्रस्ताव किसने दिया, भोज में क्या हुआ, किसने किसे सहायता दी और कितने लोग मारे गए। इन प्रसंगों की पुष्टि के लिए समकालीन प्रमाण सीमित हैं। अतः इन्हें राज्य-स्मृति और राजवंशीय वैधता के आख्यान के रूप में पढ़ना चाहिए।

राजवंशीय आख्यान अक्सर नई सत्ता की स्थापना को नैतिक रूप से उचित ठहराते हैं। वे विजेता को साहसी, चतुर अथवा अपमान का प्रतिशोध लेने वाला नायक बनाते हैं और पराजित पक्ष को कथा की आवश्यकता के अनुसार चित्रित करते हैं। गढ़कुंडार की परंपरा में भी ऐसा संभव है। औपनिवेशिक गजेटियर ने स्थानीय रियासतों से प्राप्त विवरणों को दर्ज करते समय उनके भीतर मौजूद राजनीतिक पक्षपात को हमेशा पूरी तरह नहीं खोला। इसलिए गजेटियर में कथा का मिलना उसकी सांस्कृतिक प्रचलितता का प्रमाण अवश्य है, लेकिन प्रत्येक विवरण की समकालीन सत्यता का नहीं।

खंगार दृष्टिकोण से इस कथा को पुनः पढ़ना आवश्यक है। यदि बुंदेला राज्य की उत्पत्ति का गौरवपूर्ण वृत्तांत गढ़कुंडार की विजय के बिना पूरा नहीं होता, तो यह पूर्ववर्ती खंगार सत्ता के महत्व को प्रमाणित करता है। एक नगण्य चौकी या राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक समूह को पराजित करना नई वंशीय वैधता का आधार नहीं बनता। कथा की केंद्रीयता बताती है कि गढ़कुंडार पर अधिकार क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए निर्णायक था। इस अर्थ में विजेता की स्मृति के भीतर पराजित सत्ता की शक्ति भी सुरक्षित है।

सामुदायिक संवेदना की दृष्टि से सामूहिक छल अथवा नरसंहार की कथा पीड़ा और असंतोष का विषय हो सकती है। शोध की भाषा में इसका उत्तर दूसरी असत्य या उत्तेजक कथा से देना उपयोगी नहीं। अधिक प्रभावी तरीका यह है कि घटना के स्रोत, उनके समय और उनके राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट किए जाएँ। जहाँ प्रमाण नहीं हैं, वहाँ निश्चित आरोप से बचा जाए; जहाँ पूर्ववर्ती खंगार सत्ता का उल्लेख स्पष्ट है, वहाँ उसे पूरे आत्मविश्वास से सामने रखा जाए। ऐसा लेखन समुदाय के गौरव को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसे प्रमाण-आधारित और बौद्धिक रूप से सम्मानजनक बनाता है।

10. गढ़कुंडार से ओरछा: राजधानी का स्थानांतरण

बुंदेला अधिकार के बाद गढ़कुंडार का महत्त्व समाप्त नहीं हुआ। औपनिवेशिक गजेटियर में संरक्षित राज्य-परंपरा के अनुसार यह कई पीढ़ियों तक बुंदेला सत्ता का केंद्र बना रहा। सोलहवीं शताब्दी में रुद्र प्रताप ने बेतवा नदी के निकट ओरछा को नई राजधानी के लिए चुना। स्थल-चयन 1531 के आसपास बताया गया है और दरबार का अंतिम स्थानांतरण 1539 में हुआ। तिथियों के सूक्ष्म अंतर पर आगे जाँच संभव है, लेकिन व्यापक तथ्य स्पष्ट है: गढ़कुंडार से ओरछा की ओर राजधानी का परिवर्तन बुंदेला राज्य के विस्तार और नई राजनीतिक आवश्यकताओं का संकेत था।

राजधानी बदलना केवल भवन बदलना नहीं होता। यह प्रशासनिक संसाधनों, राजपरिवार, धार्मिक प्रतिष्ठानों, सैनिकों, व्यापारिक मार्गों और प्रतीकात्मक वैधता को नए केंद्र में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया है। ओरछा की बेतवा-आधारित स्थिति, विस्तृत निर्माण की संभावना और बदलते क्षेत्रीय संबंध संभवतः अधिक उपयुक्त थे। गढ़कुंडार की पहाड़ी सुरक्षा प्रारंभिक राज्य-निर्माण के लिए लाभकारी रही होगी, जबकि विस्तृत और अधिक संस्थागत राज्य के लिए नया शहरी केंद्र आवश्यक हुआ।

इस स्थानांतरण से गढ़कुंडार का पूर्व महत्त्व भी सिद्ध होता है। यदि वह कई शताब्दियों तक प्रारंभिक बुंदेला सत्ता का केंद्र रहा, तो यह दर्शाता है कि खंगारों से प्राप्त राजनीतिक भू-दृश्य पर्याप्त विकसित और रणनीतिक था। नई सत्ता ने उसे तत्काल त्यागा नहीं, बल्कि अपने शासन के आधार के रूप में उपयोग किया। बाद के स्थापत्य निर्माण भी इसी निरंतरता का भाग हो सकते हैं। इस प्रकार गढ़कुंडार के इतिहास को “खंगार काल समाप्त, नया इतिहास आरंभ” जैसी कठोर रेखा में बाँटना उचित नहीं; सत्ता बदली, किंतु स्थान की सामरिक और प्रतीकात्मक पूँजी उत्तराधिकार में चली गई।

ओरछा की भव्य वास्तुकला ने इतिहास-लेखन में गढ़कुंडार को कुछ हद तक पीछे छोड़ दिया। विशाल महल, मंदिर, चित्रकला और मुगल-बुंदेला संबंधों ने ओरछा को अधिक दृश्य और दस्तावेजित केंद्र बना दिया। किंतु राज्य-निर्माण की पूर्वपीठिका गढ़कुंडार में थी। अतः दोनों स्थलों को प्रतिस्पर्धी स्मारकों की तरह नहीं, बल्कि बुंदेलखंडी सत्ता के क्रमिक विकास के दो चरणों के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इसमें पहला चरण खंगार राजनीतिक प्रभुत्व और प्रारंभिक बुंदेला अधिग्रहण से जुड़ा है; दूसरा चरण विस्तृत ओरछा राज्य और मुगलकालीन संबंधों से।

11. मुगल प्रशासनिक भूगोल में गढ़कुंडार

गढ़कुंडार की दीर्घकालिक राजनीतिक प्रासंगिकता का एक और संकेत मुगलकालीन प्रशासन से मिलता है। लुआर्ड के गजेटियर में यह उल्लेख है कि अकबर के समय गढ़कुंडार आगरा सूबे के एरिच सरकार के अंतर्गत एक महाल का मुख्यालय था। मुगल प्रशासन में सूबा, सरकार, परगना अथवा महाल जैसे स्तर राजस्व-संग्रह और क्षेत्रीय नियंत्रण के साधन थे। शब्दों का प्रयोग अलग-अलग स्रोतों में कुछ भिन्न हो सकता है, किंतु किसी स्थान का महाल मुख्यालय होना उसके प्रशासनिक और राजस्व महत्व का द्योतक है।

यह सूचना उस सरल धारणा को चुनौती देती है कि राजधानी के ओरछा चले जाने के बाद गढ़कुंडार तत्काल निर्जन या अप्रासंगिक हो गया। राजधानी की भूमिका समाप्त होने पर भी वह स्थानीय प्रशासन, राजस्व अथवा सैन्य नियंत्रण का केंद्र बना रह सकता था। मध्यकालीन भूगोल में पुराने दुर्गों का पुनः उपयोग सामान्य था। मजबूत संरचना, जल-सुविधा और आसपास की बस्तियों पर दृष्टि उन्हें नए प्रशासनिक तंत्र में उपयोगी बनाती थी।

मुगल प्रशासनिक संदर्भ का गहन परीक्षण आइने-अकबरी, क्षेत्रीय राजस्व अभिलेखों और फारसी दस्तावेजों से किया जाना चाहिए। वर्तमान अध्ययन गजेटियर में दर्ज सूचना को एक महत्त्वपूर्ण संकेत मानता है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। यदि एरिच सरकार के महालों की सूची और राजस्व आँकड़ों में गढ़कुंडार की स्वतंत्र पुष्टि मिलती है, तो स्थल के सोलहवीं शताब्दी के बाद के आर्थिक भूगोल पर अधिक प्रकाश पड़ सकता है। इससे यह भी ज्ञात हो सकता है कि पुरानी खंगार और बुंदेला राजधानी के आसपास का बसावट-जाल किस प्रकार बाद की प्रशासनिक इकाइयों में समाहित हुआ।

इस निरंतरता का प्रतीकात्मक अर्थ भी है। सत्ता बदलने के बावजूद भूगोल अपनी उपयोगिता बनाए रखता है। खंगारों ने जिस स्थान को क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए चुना, वही स्थल बाद के बुंदेला शासन और फिर व्यापक मुगल प्रशासनिक संरचना में अर्थपूर्ण रहा। इसलिए गढ़कुंडार को किसी एक समुदाय या काल के बंद अध्याय की तरह नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं द्वारा पुनर्परिभाषित ऐतिहासिक केंद्र की तरह देखना चाहिए। ऐसी दृष्टि खंगार योगदान को बड़े इतिहास में स्थापित करती है, न कि उसे पृथक किंवदंती तक सीमित करती है।

12. औपनिवेशिक गजेटियर और इतिहास-लेखन की सीमाएँ

ब्रिटिश प्रशासन ने भारतीय क्षेत्रों के बारे में गजेटियर इसलिए तैयार किए कि भूगोल, जनसंख्या, जाति, राजस्व, कृषि, रियासत और राजनीतिक संबंधों की उपयोगी जानकारी एकत्र हो सके। ये ग्रंथ आज इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन वे निष्पक्ष दर्पण नहीं हैं। उनका निर्माण औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक जरूरतों और यूरोपीय ज्ञान-श्रेणियों के भीतर हुआ। बुंदेलखंड गजेटियर भी इसी परंपरा का भाग है।

गढ़कुंडार संबंधी विवरण में गजेटियर ने स्थानीय रियासती स्रोतों और वंशावलियों पर निर्भरता दिखाई। ऐसी सामग्री का मूल्य इसलिए है कि वह अन्यथा खो जाने वाली परंपराओं को दर्ज करती है। पर रियासतों द्वारा उपलब्ध कराई गई वंशावलियाँ अपने शासक घराने की प्रतिष्ठा और वैधता को केंद्र में रखती थीं। बुंदेला राज्य-वृत्तांत खंगार सत्ता को मुख्यतः उस पूर्ववर्ती शक्ति के रूप में देखता है जिसे पराजित कर नया राज्य बना। खंगारों का प्रशासन, सामाजिक जीवन और अपना आत्मवृत्तांत उसमें स्वाभाविक रूप से कम दिखाई देता है। स्रोत का मौन इतिहास की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि अभिलेखीय शक्ति की असमानता भी हो सकता है।

औपनिवेशिक लेखकों ने समुदायों के बारे में नस्ली मूल, शारीरिक प्रकार और कथित सभ्यता-स्तर जैसी श्रेणियों का प्रयोग किया। ऐसी भाषा आधुनिक इतिहासलेखन में अस्वीकार्य है। समुदायों को स्थिर जैविक समूह मानना, उनके राजनीतिक उत्थान-पतन को “नस्ल” से समझाना और औपनिवेशिक सामाजिक क्रम में उन्हें ऊँचा-नीचा रखना ज्ञान के बजाय सत्ता का अभ्यास था। खंगारों के बारे में गजेटियर की ऐसी टिप्पणियाँ इतिहास का तथ्य नहीं, बल्कि उस युग के औपनिवेशिक पूर्वाग्रह का प्रमाण हैं।

स्रोत-आलोचना का अर्थ गजेटियर को पूरी तरह त्यागना भी नहीं। यदि हम केवल पक्षपात के कारण उसे छोड़ दें तो उसमें सुरक्षित स्थल और परंपरा संबंधी अनेक उपयोगी विवरण भी खो जाएँगे। उचित पद्धति यह है कि प्रत्येक सूचना को उसके प्रकार के अनुसार परखा जाए। गाँव, जलाशय, राजधानी-स्थानांतरण और प्रशासनिक इकाई जैसे विवरणों की अन्य स्रोतों से तुलना की जा सकती है। वंश-उत्पत्ति और नाटकीय संघर्ष की कथा को उत्तरकालीन स्मृति माना जाना चाहिए। जातीय मूल्यांकन को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करना चाहिए। यही आलोचनात्मक उपयोग इतिहास को अंधविश्वास और अंध-अस्वीकृति दोनों से बचाता है।

खंगार इतिहास के पुनर्लेखन में एक और समस्या दिखाई देती है: औपनिवेशिक अपमानजनक श्रेणियों के उत्तर में कभी-कभी आधुनिक लेखक उतनी ही कठोर, किंतु विपरीत दिशा की पूर्ण निश्चितता प्रस्तुत करते हैं। इससे भावनात्मक संतोष मिल सकता है, पर शोध की विश्वसनीयता कम होती है। अधिक सशक्त उत्तर यह है कि औपनिवेशिक वर्गीकरण की वैचारिक और वैज्ञानिक कमजोरी दिखाई जाए तथा राजनीतिक इतिहास के ठोस संकेत—गढ़कुंडार पर अधिकार, क्षेत्रीय सत्ता और उत्तरवर्ती विजय-वृत्तांत—सामने रखे जाएँ। समुदाय का सम्मान अवैज्ञानिक श्रेणी बदलने से नहीं, उसके वास्तविक ऐतिहासिक कर्म को समझने से स्थापित होता है।

13. साहित्य, लोक-स्मृति और गढ़कुंडार की सार्वजनिक छवि

गढ़कुंडार का इतिहास अभिलेखों तक सीमित नहीं रहा। बुंदेलखंड की मौखिक परंपराओं, वंश-कथाओं और आधुनिक हिंदी साहित्य ने इसे व्यापक सांस्कृतिक स्मृति का भाग बनाया। वृंदावनलाल वर्मा का ऐतिहासिक उपन्यास गढ़कुंडार इस सार्वजनिक छवि के निर्माण में विशेष रूप से प्रभावशाली रहा है। साहित्य इतिहास से सामग्री ग्रहण करता है, लेकिन उसका उद्देश्य अभिलेखीय रिपोर्ट देना नहीं होता। चरित्र, संवाद, प्रेम, संघर्ष और नाटकीयता साहित्यिक संरचना के अनुसार विकसित होते हैं। इसलिए उपन्यास को तेरहवीं शताब्दी का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं, बल्कि बीसवीं शताब्दी में मध्यकालीन बुंदेलखंड की पुनर्कल्पना के रूप में पढ़ना चाहिए।

यह विभाजन साहित्य का महत्व घटाता नहीं। उपन्यास और लोककथा उन भावनाओं, नैतिक प्रश्नों और पहचान-संघर्षों को जीवित रखते हैं जिन्हें प्रशासनिक अभिलेख दर्ज नहीं करते। वे बताते हैं कि समाज ने अतीत को किस रूप में याद करना चुना। गढ़कुंडार की स्मृति में सम्मान, विवाह, विश्वासघात, वीरता और राज्य-हानि के विषय बार-बार आते हैं। ये विषय समुदायों के बीच संबंधों और आधुनिक पहचान-निर्माण में प्रभाव डालते हैं। इसलिए उनका अध्ययन “स्मृति का इतिहास” है, भले वे घटना के हर विवरण का प्रमाण न हों।

लोक-स्मृति की अपनी पद्धति होती है। वह वर्षों और दस्तावेजों से अधिक नाम, स्थान, वंश और नैतिक संदेश को संरक्षित कर सकती है। कई पीढ़ियों में कथा बदलती है, नए प्रसंग जुड़ते हैं और समकालीन सामाजिक प्रश्न अतीत में प्रतिबिंबित होते हैं। गढ़कुंडार की विभिन्न कथाओं में पात्रों के नाम और घटना-क्रम का बदलना इसी जीवंत प्रक्रिया का संकेत है। इतिहासकार को विविध संस्करणों को दर्ज कर उनकी आयु, प्रसार और सामाजिक संदर्भ समझना चाहिए। किसी एक लोकप्रिय संस्करण को “एकमात्र मूल सत्य” घोषित करना लोक परंपरा की वास्तविक बहुलता को नष्ट कर देता है।

आधुनिक डिजिटल माध्यमों ने रहस्य-केंद्रित छवि को बहुत बढ़ाया है। “किला आँखों से गायब हो जाता है”, “भूमिगत अनेक मंजिलें हैं”, “अज्ञात खजाना छिपा है” अथवा “जो भीतर गया लौटकर नहीं आया” जैसे कथन दर्शक आकर्षित करते हैं। इनमें से कुछ का आधार वास्तविक भू-दृश्य, तहखाने और स्थानीय चेतावनी हो सकता है, लेकिन सनसनीखेज प्रस्तुति ऐतिहासिक स्थल को मनोरंजन की वस्तु बना देती है। इससे अनधिकृत प्रवेश, संरचना को नुकसान और खजाने की खोज में अवैध खुदाई का खतरा भी बढ़ सकता है।

गढ़कुंडार की बेहतर सार्वजनिक व्याख्या में तीनों स्तर साथ रखे जा सकते हैं। सूचना-पट्ट पर प्रमाणित कालक्रम और स्थल-विवरण दिया जाए; अलग खंड में स्थानीय लोककथाएँ उनके संस्करणों सहित बताई जाएँ; और साहित्यिक कृतियों के सांस्कृतिक प्रभाव को स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किया जाए। इससे आगंतुक को न तो शुष्क तथ्य-सूची मिलेगी और न मिथक को तथ्य समझने की मजबूरी होगी। खंगार समुदाय के प्रतिनिधियों से संकलित मौखिक इतिहास इस व्याख्या को अधिक संतुलित बना सकता है।

14. खंगार सामुदायिक पहचान में गढ़कुंडार

आधुनिक भारत में ऐतिहासिक स्थल समुदायों के लिए आत्मसम्मान, संगठन और सांस्कृतिक निरंतरता के केंद्र बनते हैं। खंगार समुदाय के लिए गढ़कुंडार ऐसा ही स्थान है। सामाजिक और प्रशासनिक वर्गीकरण समय तथा राज्य के अनुसार बदल सकते हैं, किंतु वे मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास की पूरी परिभाषा नहीं हैं। किसी समुदाय की वर्तमान स्थिति को उसके अतीत पर यांत्रिक रूप से आरोपित करना इतिहास-विरोधी है। गढ़कुंडार खंगारों की क्षेत्रीय सत्ता और राज्य-निर्माण की क्षमता का ऐसा प्रमाण है जिसे आधुनिक श्रेणियों से छोटा नहीं किया जा सकता।

समुदाय-आधारित इतिहासलेखन की आवश्यकता इसलिए भी है कि प्रमुख राजवंशों और औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा लिखे स्रोतों में पराजित या सत्ता से बाहर हुए समूहों की आवाज कम रहती है। खंगारों की वंश-स्मृतियाँ, कुलदेवी परंपराएँ, विवाह-संबंध, तीर्थ-यात्राएँ, स्मारक आयोजन और गढ़कुंडार से जुड़े गीत वैकल्पिक अभिलेख का कार्य कर सकते हैं। इन्हें व्यवस्थित रूप से रिकॉर्ड करना, वक्ता की जानकारी और तारीख सुरक्षित करना तथा विभिन्न क्षेत्रों के संस्करणों की तुलना करना भविष्य के शोध की प्राथमिकता होनी चाहिए।

हालाँकि सामुदायिक गौरव और आलोचनात्मक इतिहास को विरोधी नहीं मानना चाहिए। गौरव सबसे स्थायी तब होता है जब वह जाँच का सामना कर सके। उदाहरणतः “गढ़कुंडार खंगार सत्ता का केंद्र था” उपलब्ध स्रोतों से समर्थित मजबूत कथन है। “आज की प्रत्येक संरचना एक ही खंगार शासक ने एक ही वर्ष में बनवाई” जैसा कथन अभी उतने प्रमाण से समर्थित नहीं। पहले कथन पर दृढ़ रहना और दूसरे को शोधाधीन कहना ईमानदारी है, कमजोरी नहीं।

इसी प्रकार बुंदेला-खंगार संबंधों को आज के समुदायों के बीच वैमनस्य का आधार बनाना ऐतिहासिक रूप से अनुपयोगी है। मध्यकालीन युद्ध राजवंशीय सत्ता, भूभाग और गठबंधनों के लिए होते थे; आधुनिक व्यक्तियों को उनके पूर्वज माने जाने वाले समूहों की घटनाओं के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। स्रोत-आधारित लेखन अन्य परंपराओं का अपमान किए बिना खंगार दृष्टि की अनुपस्थिति को पूरा कर सकता है। लक्ष्य स्मृति को मिटाना नहीं, उसे अधिक न्यायपूर्ण और बहुवाचक बनाना है।

गढ़कुंडार से जुड़े सामुदायिक आयोजनों में शोध-संगोष्ठी, अभिलेख प्रदर्शनी, मौखिक इतिहास रिकॉर्डिंग और संरक्षण-श्रम जैसे कार्यक्रम जोड़े जा सकते हैं। इससे स्मारक केवल प्रतीक नहीं रहेगा, बल्कि ज्ञान-निर्माण का सक्रिय केंद्र बनेगा। युवा शोधार्थियों को पुरालेख, पुरातत्त्व, स्थानीय इतिहास और डिजिटल अभिलेखीकरण का प्रशिक्षण देकर समुदाय अपने इतिहास के स्रोत स्वयं सुरक्षित कर सकता है। यह कार्य भावनात्मक नारों से अधिक दीर्घकालिक प्रभाव डालेगा।

15. मिथक, दावे और प्रमाण: एक आलोचनात्मक परीक्षण

गढ़कुंडार से संबंधित दावों को व्यवस्थित करने के लिए प्रमाण-स्तर स्पष्ट करना उपयोगी है। पहला दावा कि गढ़कुंडार बुंदेला अधिकार से पहले खंगारों के नियंत्रण में था, औपनिवेशिक गजेटियर में दर्ज राज्य-परंपरा और बुंदेला उदय-कथा दोनों से समर्थित है। इसे अपेक्षाकृत मजबूत ऐतिहासिक निष्कर्ष माना जा सकता है। दूसरा दावा कि चंदेल सत्ता के विघटन के बाद खंगारों ने तहरौली क्षेत्र में प्रभुत्व बनाया, उसी गजेटियर में स्पष्ट है और व्यापक राजनीतिक संदर्भ से संगत है; इसकी स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि शोध को और मजबूत करेगी।

तीसरा दावा कि सत्ता-परिवर्तन ठीक 1257 में और कथा में वर्णित प्रत्येक प्रसंग के अनुसार हुआ, सावधानी की माँग करता है। तिथि उत्तरकालीन वंश-वृत्तांत में संरक्षित हो सकती है, किंतु समकालीन दिनांकित अभिलेख के अभाव में इसे “परंपरागत तिथि” कहना अधिक उचित है। चौथा दावा कि वर्तमान दुर्ग की पूरी संरचना खंगार काल की है, गजेटियर के उत्तरकालीन निर्माण-संकेत के कारण अभी सिद्ध नहीं। स्थल प्राचीन और खंगार राजनीतिक केंद्र था; मौजूदा भवनों में अनेक काल की परतें होना अधिक संभावित है।

पाँचवाँ दावा कि दुर्ग अलौकिक रूप से गायब होता है, प्राकृतिक स्थलाकृति और दृष्टि-रेखा से समझा जा सकता है। यह अनुभव वास्तविक हो सकता है, उसकी अलौकिक व्याख्या आवश्यक नहीं। छठा दावा कि कई भूमिगत मंजिलों में विशाल खजाना है, वैज्ञानिक सर्वेक्षण के बिना अप्रमाणित है। तहखाने या भूमिगत कक्ष होने की संभावना अलग बात है; खजाने की कथा अलग। दोनों को मिलाने से अवैध खुदाई और सुरक्षा जोखिम बढ़ता है।

सातवाँ दावा किसी एक लोककथा में उल्लिखित सामूहिक भोज और हत्या के हर विवरण को तथ्य मानता है। उपलब्ध स्रोत इसे व्यापक रूप से प्रचलित राजवंशीय कथा सिद्ध करते हैं, लेकिन समकालीन प्रत्यक्ष विवरण नहीं। इसलिए इसे खंगार-बुंदेला सत्ता-परिवर्तन की स्मृति का प्रभावशाली रूप कहा जाना चाहिए। आठवाँ दावा कि पराजय के साथ खंगारों की ऐतिहासिक भूमिका समाप्त हो गई, स्पष्टतः अनुचित है। समुदाय, वंश-स्मृति और क्षेत्रीय उपस्थिति सत्ता-परिवर्तन के बाद भी बनी रही; केवल राजकीय अभिलेखों में दृश्यता कम हुई।

ऐसी प्रमाण-सारणी सार्वजनिक इतिहास के लिए उपयोगी है क्योंकि वह पाठक को निर्णय की प्रक्रिया दिखाती है। इतिहास केवल तैयार निष्कर्षों का संग्रह नहीं; वह प्रमाण, संभावना और अनिश्चितता के बीच अनुशासित अंतर है। खंगार इतिहास की प्रामाणिकता इसी अनुशासन से मजबूत होगी। जहाँ प्रमाण दृढ़ है, वहाँ अस्पष्ट भाषा की आवश्यकता नहीं; जहाँ प्रमाण सीमित है, वहाँ ईमानदार सीमा बताना शोध की विश्वसनीयता बढ़ाता है।

16. संरक्षण की वर्तमान आवश्यकता और स्थानीय भागीदारी

गढ़कुंडार जैसे दुर्ग के संरक्षण में मुख्य भवन की मरम्मत के साथ पूरे ऐतिहासिक भू-दृश्य की रक्षा आवश्यक है। दीवारों में दरार, छतों से पानी का प्रवेश, वनस्पति की जड़ें, पत्थर का क्षरण, अनियंत्रित पर्यटक गतिविधि और अनधिकृत खुदाई सामान्य खतरे हैं। यदि मरम्मत बिना स्थापत्य अध्ययन के की जाए तो नया गारा, सीमेंट या पत्थर मूल तकनीक और दृश्य चरित्र को नुकसान पहुँचा सकता है। प्रत्येक हस्तक्षेप से पहले स्थिति-मानचित्र, सामग्री-परीक्षण और फोटोग्राफिक अभिलेख तैयार होना चाहिए।

2025 में प्रकाशित समाचार-रिपोर्टों में मध्य प्रदेश के पुरातत्त्व, अभिलेखागार और संग्रहालय संचालनालय की संरक्षण पहलों में गढ़कुंडार को शामिल किए जाने की सूचना दी गई। रिपोर्टों के अनुसार संरचनात्मक जोड़ाई, दीवार और छत की मरम्मत, प्रवेश-व्यवस्था और वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण जैसे कार्य प्रस्तावित या आरंभिक कार्यक्रम का भाग थे। चूँकि यह जानकारी समाचार माध्यमों से प्राप्त है, कार्य की वास्तविक सीमा, निविदा, तकनीकी रिपोर्ट और पूर्णता की पुष्टि संबंधित विभागीय अभिलेख से की जानी चाहिए। फिर भी यह संकेत सकारात्मक है कि स्थल संरक्षण-नीति में ध्यान प्राप्त कर रहा है।

संरक्षण का अर्थ केवल भौतिक मरम्मत नहीं। सटीक व्याख्या, स्थानीय रोजगार, आगंतुक प्रबंधन और समुदाय का विश्वास भी आवश्यक है। यदि स्थानीय और खंगार समुदाय को इतिहास-लेखन तथा व्याख्या से बाहर रखा जाए तो संरक्षण बाहरी परियोजना जैसा लगेगा। यदि केवल सामुदायिक दावा हो और वैज्ञानिक पद्धति न हो तो पेशेवर संरक्षण कठिन होगा। दोनों को सहभागी ढाँचे में जोड़ना चाहिए। सलाहकार समिति में पुरातत्त्वविद्, स्थापत्य संरक्षण विशेषज्ञ, स्थानीय प्रशासन, ग्राम प्रतिनिधि, खंगार इतिहास-शोधकर्ता और पर्यटन प्रबंधन से जुड़े लोग शामिल हो सकते हैं।

डिजिटल संरक्षण भी तत्काल आवश्यक है। दुर्ग और पुरानी बस्ती का उच्च-रिज़ॉल्यूशन फोटोग्रामेट्री सर्वेक्षण, त्रि-आयामी मॉडल, ड्रोन-आधारित स्थलाकृति मानचित्र और सभी उपलब्ध अभिलेखों का डिजिटल संग्रह भविष्य के लिए आधार बन सकता है। किसी आपदा या क्षरण की स्थिति में यह दस्तावेजीकरण अमूल्य होगा। साथ ही शोधार्थी विभिन्न निर्माण-चरणों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकेंगे। संवेदनशील क्षेत्रों और संभावित पुरातात्त्विक स्थलों की सार्वजनिक जानकारी सीमित रखनी चाहिए ताकि लूट या अवैध उत्खनन न बढ़े।

पर्यटन-विकास में “रहस्य” को एकमात्र आकर्षण बनाने के बजाय इतिहास की परतों को अनुभव में बदला जा सकता है। एक व्याख्या-केंद्र में चंदेल उत्तरकाल, खंगार सत्ता, बुंदेला अधिग्रहण, राजधानी स्थानांतरण और मुगल प्रशासन का कालक्रम दिखाया जाए। पुरानी बस्ती और जलाशय तक निर्देशित विरासत-पथ विकसित हो। स्थानीय प्रशिक्षित मार्गदर्शक प्रमाणित जानकारी और लोककथा के बीच अंतर बताते हुए दोनों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करें। इससे स्थानीय आय, स्मारक-सम्मान और ऐतिहासिक समझ तीनों बढ़ेंगे।

17. आगे के शोध की दिशा

गढ़कुंडार पर एक निर्णायक शैक्षणिक इतिहास के लिए अंतर्विषयी परियोजना की आवश्यकता है। सबसे पहले स्थल और आसपास की पुरानी बस्ती का व्यवस्थित पुरातात्त्विक सर्वेक्षण होना चाहिए। सतही मृद्भांड, निर्माण-सामग्री, बसावट-टीले और जल-संरचनाएँ कालक्रम बनाने में सहायक होंगी। जहाँ आवश्यक और विधिसम्मत हो, सीमित उत्खनन से विभिन्न निवास-स्तरों तथा विनाश या पुनर्निर्माण की परतों का पता चल सकता है। जैविक सामग्री मिलने पर वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण उपयोगी होगा।

दूसरा, स्थापत्य का चरणबद्ध अध्ययन आवश्यक है। प्रत्येक दीवार, बुर्ज, द्वार, कक्ष और महल-खंड का मापचित्र बनाकर निर्माण-जोड़ों की पहचान की जाए। पत्थर काटने की शैली, गारे की संरचना, मेहराब, छत और सजावट की तुलना दतिया, ओरछा तथा बुंदेलखंड के दिनांकित स्मारकों से की जा सकती है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि कौन-सी परत प्रारंभिक दुर्गीकरण की है और कौन-सी उत्तरकालीन बुंदेला मरम्मत या विस्तार की।

तीसरा, अभिलेखीय खोज का विस्तार किया जाना चाहिए। ओरछा और दतिया रियासतों के पुराने अभिलेख, फारसी दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड, वंशावलियाँ, मंदिर-बही, ब्रिटिश राजनीतिक एजेंसी की फाइलें और पुरालेख विभाग के अप्रकाशित सर्वेक्षण उपयोगी हो सकते हैं। गजेटियर में उल्लिखित संवत् 1313 वाले अभिलेख का पता लगाना विशेष प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि वह सुरक्षित है, तो विशेषज्ञ पुनर्पाठ गढ़कुंडार के तेरहवीं शताब्दी के इतिहास में निर्णायक योगदान दे सकता है।

चौथा, मौखिक इतिहास परियोजना चलाई जानी चाहिए। निवाड़ी, झाँसी, दतिया, सागर और अन्य क्षेत्रों के खंगार परिवारों से गढ़कुंडार संबंधी कथाएँ, वंश-नाम, कुलदेवी परंपराएँ और पुराने दस्तावेज रिकॉर्ड किए जाएँ। उसी प्रकार बुंदेला तथा स्थानीय अन्य समुदायों के संस्करण भी संकलित हों। उद्देश्य किसी एक कथा को तत्काल विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि स्मृति के भौगोलिक और सामाजिक प्रसार को समझना हो। रिकॉर्डिंग के साथ सहमति, वक्ता की पहचान, तारीख और स्थान सुरक्षित किए जाएँ।

पाँचवाँ, स्थान-नामों और ऐतिहासिक मार्गों का अध्ययन उपयोगी होगा। “गढ़”, “कुंडार”, तहरौली और आसपास के गाँवों के पुराने नाम विभिन्न मानचित्रों, राजस्व अभिलेखों और मौखिक उच्चारणों से तुलना माँगते हैं। मार्ग-विश्लेषण से गढ़कुंडार का महोबा, कालिंजर, एरिच, झाँसी, दतिया और ओरछा से संबंध अधिक स्पष्ट हो सकता है। भू-सूचना प्रणाली के माध्यम से दृश्यता, जलागम, कृषि-क्षेत्र और यात्रा दूरी का मॉडल बनाया जा सकता है।

अंततः शोध के परिणाम खुले और बहुभाषी रूप में उपलब्ध होने चाहिए। तकनीकी रिपोर्ट के साथ सरल हिंदी सारांश, स्थानीय बुंदेली प्रस्तुति, विद्यालय सामग्री और डिजिटल प्रदर्शनी तैयार की जा सकती है। इससे ज्ञान केवल विश्वविद्यालय या विभाग में बंद नहीं रहेगा। खंगार समुदाय और स्थानीय निवासियों ने जिस स्थल-स्मृति को पीढ़ियों तक जीवित रखा, उन्हें शोध के निष्कर्षों तक प्राथमिक पहुँच मिलनी चाहिए।

18. निष्कर्ष

गढ़कुंडार का इतिहास किसी एक रहस्य, एक युद्ध अथवा एक इमारत की निर्माण-तिथि में समाहित नहीं किया जा सकता। यह एक दीर्घकालिक दुर्गीकृत भू-दृश्य है जहाँ प्राकृतिक सुरक्षा, जल, बसावट और राजनीतिक स्मृति ने अनेक शताब्दियों तक मिलकर काम किया। चंदेल शक्ति के विघटन के बाद खंगारों ने गढ़कुंडार और तहरौली क्षेत्र में क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित किया—यह उपलब्ध गजेटियर परंपरा और उत्तरकालीन बुंदेला राज्य-वृत्तांत से समर्थित सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। खंगार सत्ता कोई आधुनिक कल्पना भर नहीं; वह उस राजनीतिक क्रम का आवश्यक अंग है जिसे नया बुंदेला राज्य अपनी स्थापना-कथा में भी अनदेखा नहीं कर सका।

साथ ही स्रोत हमें सावधान करते हैं कि राजनीतिक स्थल की प्राचीनता और आज दिखाई देने वाले दुर्ग की प्रत्येक स्थापत्य परत को समान न माना जाए। गढ़कुंडार खंगार सत्ता का केंद्र था, पर परिसर में बाद के बुंदेला निर्माण और पुनर्गठन के संकेत हैं। इस बहुस्तरीयता को स्वीकार करना खंगार गौरव को कम नहीं करता। उलटे, यह बताता है कि स्थल इतना महत्त्वपूर्ण था कि उत्तरवर्ती राजसत्ता ने उसे अपनाया, विकसित किया और कई पीढ़ियों तक उपयोग किया। 1539 के आसपास राजधानी ओरछा जाने तथा अकबरकालीन प्रशासन में महाल मुख्यालय के रूप में उल्लेखित होने तक इसकी राजनीतिक उपयोगिता बनी रही।

बुंदेला अधिग्रहण की विवाह और संघर्ष-कथा सामाजिक स्मृति का प्रभावशाली हिस्सा है, पर उसके नाटकीय विवरण उत्तरकालीन राजवंशीय आख्यान से आए हैं। शोध को मूल सत्ता-परिवर्तन और कथा के साहित्यिक विस्तार में अंतर करना चाहिए। इसी प्रकार “गायब होने वाले किले”, खजाने और सुरंगों की लोकप्रिय कथाएँ स्थल के आकर्षण का हिस्सा हो सकती हैं, पर उन्हें पुरातात्त्विक प्रमाण का स्थान नहीं दिया जा सकता। इतिहास, लोक-स्मृति और साहित्य को अलग श्रेणियों में सम्मान देने से ही गढ़कुंडार का पूर्ण अर्थ सामने आता है।

खंगार समुदाय के लिए गढ़कुंडार स्वाधीन राजनीतिक अस्तित्व, राज्य-निर्माण और ऐतिहासिक आत्मसम्मान का केंद्रीय प्रतीक है। इस पहचान को सबसे अधिक शक्ति प्रमाण-संग्रह, पुरालेखीय खोज, स्थापत्य अध्ययन और मौखिक इतिहास से मिलेगी। सामुदायिक गौरव और वैज्ञानिक पद्धति एक-दूसरे के विरोधी नहीं; दोनों का मेल ही ऐसी विरासत तैयार करता है जो आने वाली पीढ़ियों और व्यापक शैक्षणिक जगत में सम्मान प्राप्त करे।

गढ़कुंडार का संरक्षण भी इसी समेकित दृष्टि से होना चाहिए। मुख्य दुर्ग के साथ पुरानी बस्ती, जलाशय, मार्ग और स्मृति-स्थलों को संरक्षण-परिसर का भाग माना जाए। स्थानीय तथा खंगार समुदाय को अनुसंधान और व्याख्या में सहभागी बनाया जाए। अभिलेख, स्थापत्य और मौखिक परंपरा का डिजिटल संग्रह तैयार हो। तब गढ़कुंडार केवल अतीत का अवशेष नहीं रहेगा; वह बुंदेलखंड के बहुस्तरीय इतिहास और खंगार राजनीतिक विरासत का जीवित ज्ञान-केंद्र बन सकता है।

स्रोत-टिप्पणियाँ

  1. सी. ई. लुआर्ड द्वारा संकलित Eastern States Gazetteer: Bundelkhand, Vol. VI-A (1907) इस अध्ययन का प्रमुख औपनिवेशिक स्रोत है। इसकी भूमिका स्वयं सामग्री-संकलन की सीमाएँ स्वीकार करती है; इसलिए इसका उपयोग आलोचनात्मक ढंग से किया गया है।
  2. गजेटियर में चंदेल सत्ता के विघटन के बाद खंगारों द्वारा तहरौली क्षेत्र पर अधिकार और गढ़कुंडार को उनके केंद्र के रूप में दर्ज किया गया है। डिजिटल पाठ में व्यक्तिगत नामों की वर्तनी अस्पष्ट हो सकती है; मूल मुद्रित प्रति और स्थानीय वंशावलियों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
  3. सोहनपाल, हुरमत सिंह, विवाह-संबंध और 1257 की तिथि गजेटियर में दर्ज रियासती परंपरा से आती है। इसे सत्ता-परिवर्तन की उत्तरकालीन स्मृति के रूप में उद्धृत किया गया है, समकालीन प्रत्यक्ष अभिलेख के रूप में नहीं।
  4. गढ़कुंडार की पुरानी बस्ती, घने वन, पहाड़ी दुर्ग, सिंह सागर, राजधानी के 1539 में ओरछा स्थानांतरण तथा अकबरकालीन एरिच सरकार में महाल मुख्यालय संबंधी सूचनाएँ भी इसी गजेटियर के स्थल-विवरण में मिलती हैं।
  5. गजेटियर द्वारा वर्तमान दुर्ग की प्रमुख संरचना को वीर सिंह देव से जोड़ना स्थल पर उत्तरकालीन स्थापत्य परत का संकेत है। इसे अंतिम स्थापत्य निष्कर्ष नहीं माना गया; वैज्ञानिक भवन-सर्वेक्षण अपेक्षित है।
  6. संवत् 1313 के अंकों वाले कथित क्षतिग्रस्त अभिलेख का उल्लेख गजेटियर में है। अभिलेख के वर्तमान स्थान, पूर्ण पाठ और प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इससे आगे का दावा नहीं किया गया है।
  7. 2025 की संरक्षण गतिविधियों का उल्लेख समकालीन समाचार-रिपोर्टों पर आधारित है। आधिकारिक तकनीकी प्रतिवेदन उपलब्ध होने पर प्रस्तावित और पूर्ण कार्यों का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक होगा।

संदर्भ सूची

  • Luard, C. E., comp. Eastern States Gazetteer: Bundelkhand, Vol. VI-A (Text). Allahabad: Pioneer Press, 1907. Internet Archive digital edition: https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.35024
  • Abul Fazl. Ain-i-Akbari. विभिन्न अनुवाद और संस्करण। गढ़कुंडार तथा एरिच सरकार के प्रशासनिक संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अपेक्षित प्राथमिक स्रोत।
  • Cunningham, Alexander तथा Archaeological Survey of India की बुंदेलखंड संबंधी सर्वेक्षण-रिपोर्टें। स्थल और आसपास के अभिलेखीय-पुरातात्त्विक संदर्भ के तुलनात्मक अध्ययन हेतु।
  • Verma, Vrindavan Lal. Garh Kundar. हिंदी ऐतिहासिक उपन्यास के विभिन्न संस्करण। साहित्यिक और आधुनिक सांस्कृतिक स्मृति के स्रोत के रूप में प्रयुक्त, प्रत्यक्ष मध्यकालीन प्रमाण के रूप में नहीं।
  • Archaeological Survey of India. “Cultural Monuments and Protected Sites” से संबंधित आधिकारिक डिजिटल संसाधन तथा Bhuvan-ASI मानचित्रण परियोजना: https://bhuvan-app1.nrsc.gov.in/culture_monuments/
  • “MP launches major heritage conservation drive; Garh Kundar Fort among identified monuments.” The Times of India, 2025. समकालीन संरक्षण पहल के समाचार-संदर्भ के रूप में।
  • “From Vitasta to Vikas: Madhya Pradesh archaeology and heritage conservation initiatives.” The Times of India, 2025. प्रस्तावित संरक्षण कार्यों के समाचार-संदर्भ के रूप में।
  • मध्य प्रदेश पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय की गढ़कुंडार से संबंधित भावी तकनीकी रिपोर्टें, संरक्षण दस्तावेज और अधिसूचनाएँ—आगे के सत्यापन हेतु अनुशंसित।

शोध की सीमा और घोषणा

यह लेख उपलब्ध प्रकाशित स्रोतों और डिजिटल रूप से सुलभ सामग्री का स्रोत-आलोचनात्मक अध्ययन है; यह पुरातात्त्विक उत्खनन-रिपोर्ट अथवा किसी नए अभिलेख का प्रथम प्रकाशन नहीं है। जहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं, वहाँ निष्कर्ष को संभावना, परंपरा अथवा शोध-प्रश्न के रूप में स्पष्ट किया गया है। लेख का उद्देश्य गढ़कुंडार में खंगार राजनीतिक विरासत को प्रमाण-आधारित ढंग से स्थापित करना, अतिरंजना से बचाना और आगे के पेशेवर अनुसंधान के लिए स्पष्ट दिशा देना है।

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