महाराजा खेतसिंह खंगार मध्यकालीन भारत के एक महान हिंदू क्षत्रिय सम्राट थे, जिन्हें जुझौतिखण्ड (वर्तमान बुंदेलखंड) के निर्माता के रूप में स्मरण किया जाता है। वे अपनी वीरता, नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध थे।
उनका जन्म २७ दिसम्बर ११४० ईस्वी (विक्रम संवत ११९७, पौष शुक्ल पक्ष) में सौराष्ट्र (गुजरात) के जूनागढ़ में हुआ था। उनके पिता रा कटाव द्वितीय रूढ़देव जूनागढ़ के अधिपति थे तथा माता किशोर कुँवर बाई थीं। बचपन से ही खेतसिंह में अद्भुत साहस और युद्धकौशल दिखाई देता था, विशेष रूप से वे तलवार चलाने में निपुण थे।
युवावस्था में एक सिंह से युद्ध कर उसे परास्त करने की घटना ने उनकी वीरता को प्रसिद्ध कर दिया। इस पराक्रम से प्रभावित होकर सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने उन्हें अपने दरबार में आमंत्रित किया और “सिंह” की उपाधि प्रदान की।
महाराजा खेतसिंह, पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सामंत और सेनापति बने। उन्होंने उनके साथ कई महत्वपूर्ण युद्धों में भाग लिया, जिनमें ११८१ ई. का जेजाकभुक्ति युद्ध तथा महोबा का युद्ध प्रमुख हैं। इन युद्धों में उनकी वीरता और नेतृत्व अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए।
इन विजयों के पश्चात पृथ्वीराज चौहान ने ११८१ ई. में उनका राज्याभिषेक कर उन्हें जुझौतिखण्ड का शासक घोषित किया। महाराजा खेतसिंह ने गढ़कुंडार को अपनी राजधानी बनाकर एक संगठित और सशक्त राज्य की स्थापना की।
११९२ ई. में तराइन के युद्ध के बाद जब पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए और दिल्ली विदेशी आक्रमणकारियों के अधीन हो गई, तब महाराजा खेतसिंह ने जुझौतिखण्ड को स्वतंत्र हिन्दू गणराज्य घोषित किया, जो उनकी स्वाधीनता और क्षत्रिय स्वाभिमान का प्रतीक था।
सन १२१२ ई. में उनका निधन हो गया, परंतु उनकी विरासत उनके उत्तराधिकारियों राजा नन्दपाल, छत्रपाल सिंह, खूबसिंह और मानसिंह खंगार द्वारा आगे बढ़ाई गई। खंगारों का शासन लगभग १६५ वर्षों तक (११८२–१३४७ ई.) जुझौतिखण्ड पर बना रहा।
महाराजा खेतसिंह खंगार को एक संस्थापक, वीर योद्धा और कुशल शासक के रूप में स्मरण किया जाता है, जिनकी विरासत बुंदेलखंड के इतिहास में अमर है।
उस काल का एक प्रसिद्ध दोहा जुझौतिखण्ड की वीरता को दर्शाता है:
गिर समान गौरव रहे, सिंधु समान स्नेह।
वर समान वैभव रहे, ध्रुव समान धेय्य।।
विजय पराजय न लिखें, यम न पावें पंथ।
जय जय भूमि जुझौति की, होये जूझ के अंत।।
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