मालवा की लड़ाइयों से लेकर खानवा के विशाल रणक्षेत्र तक दो नाम बार-बार साथ दिखाई देते हैं—महाराणा संग्राम सिंह और महाराजा मेदिनी राय खंगार। एक मेवाड़ की बढ़ती राजपूत शक्ति का केंद्र था, दूसरा मालवा की राजनीति से निकलकर चंदेरी में अपना राज्य खड़ा करने वाला अनुभवी सेनानायक। दोनों का साथ केवल युद्ध के समय किया गया समझौता नहीं था; यह उत्तर भारत के बदलते शक्ति-संतुलन में बना दीर्घकालिक राजनीतिक और सैन्य संबंध था।
मेदिनी राय और राणा सांगा के संबंध को समझे बिना चंदेरी के 1528 युद्ध की पृष्ठभूमि अधूरी रहती है। बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण केवल एक दुर्ग जीतने के लिए नहीं किया था। उसके सामने राणा सांगा के सबसे प्रतिष्ठित सहयोगियों में से एक का केंद्र था।
मालवा के संकट ने दोनों को पास लाया
सोलहवीं शताब्दी के आरंभ में मालवा सल्तनत अंदरूनी संघर्ष से जूझ रही थी। मेदिनी राय सुल्तान महमूद द्वितीय के प्रमुख अधिकारी के रूप में प्रभावशाली हो चुके थे। राजपूत अधिकारियों की बढ़ती भूमिका से पुराने अमीरों में असंतोष था। दरबार का संघर्ष बढ़ा तो गुजरात और मेवाड़ जैसी पड़ोसी शक्तियां भी उसमें शामिल होने लगीं।
राणा सांगा के लिए मालवा केवल पड़ोसी क्षेत्र नहीं था। वहां गुजरात का प्रभाव बढ़ना मेवाड़ के लिए सामरिक चुनौती बन सकता था। मेदिनी राय को सहयोग देकर वे मालवा में ऐसा मित्र केंद्र खड़ा कर सकते थे जो मेवाड़ की पूर्वी दिशा को मजबूत करे। मेदिनी राय के लिए राणा सांगा की सेना वह सहारा थी जिसके बल पर वे दरबारी विरोध के बाद भी अपना राजनीतिक अस्तित्व बचा सकते थे।
यहीं से दोनों के हित एक हुए। सहायता केवल सैनिक नहीं रही। मेदिनी राय धीरे-धीरे राणा सांगा के विश्वस्त मंडल में शामिल हो गए। बाबरनामा में उन्हें राणा सांगा के उच्च और प्रतिष्ठित सरदारों में रखा गया है। यह उल्लेख बताता है कि मेवाड़ की राजनीति में उनका स्थान किसी सामान्य सामंत का नहीं था।
गागरोन के संघर्ष से मजबूत हुआ भरोसा
मालवा और मेवाड़ के बीच हुए संघर्षों में गागरोन का नाम विशेष रूप से आता है। अलग ग्रंथ घटनाओं का क्रम कुछ भिन्न ढंग से बताते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि राणा सांगा ने मालवा की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप किया और मेदिनी राय की स्थिति मजबूत हुई। युद्धों में साथ लड़ने से दोनों पक्षों के बीच ऐसा भरोसा बना जो आगे भी कायम रहा।
मध्यकालीन गठबंधन केवल लिखित संधियों से नहीं चलते थे। उनमें व्यक्तिगत निष्ठा, युद्ध में सहयोग, भू-भाग का संरक्षण और संकट के समय सहायता महत्वपूर्ण होती थी। मेदिनी राय ने राणा सांगा को मालवा की राजनीतिक और भौगोलिक समझ दी, जबकि राणा सांगा ने उन्हें सैन्य संरक्षण और चंदेरी में स्थिर आधार प्रदान किया।
चंदेरी बना राजपूत शक्ति का पूर्वी स्तंभ
मेवाड़ से पूर्व की ओर देखें तो चंदेरी का स्थान तुरंत समझ आता है। पहाड़ी किला मालवा और बुंदेलखंड के बीच था। नगर व्यापारिक मार्गों और संपन्न बाजार से जुड़ा था। यहां मेदिनी राय की शक्ति का अर्थ था कि राणा सांगा का प्रभाव सीधे मेवाड़ की सीमाओं से बहुत आगे तक पहुंचता है।
चंदेरी की जिम्मेदारी देना केवल पुरस्कार नहीं था। वह विश्वास की जिम्मेदारी थी। इस दुर्ग को संभालने वाला शासक स्वतंत्र निर्णय लेने, सेना संगठित करने और बड़े आक्रमण के सामने टिकने की क्षमता रखता हो—यह आवश्यक था। मेदिनी राय ने चंदेरी को राजधानी के रूप में विकसित कर इस विश्वास को सही सिद्ध किया।
बाबर के विरुद्ध राजपूत संघ
पानीपत की विजय के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया। राणा सांगा और उत्तर भारत के अनेक राजपूत शासकों ने इसे नई चुनौती के रूप में देखा। 1527 में खानवा के मैदान में दोनों शक्तियां आमने-सामने आईं। मेदिनी राय इस राजपूत पक्ष के प्रमुख सहयोगियों में थे।
खानवा का युद्ध केवल दो शासकों का द्वंद्व नहीं था। यह अलग-अलग राजपूत केंद्रों और बाबर की संगठित सेना के बीच निर्णायक संघर्ष था। बाबर की सेना ने तोपखाने, रक्षात्मक गाड़ियों और अनुशासित युद्ध-व्यवस्था का उपयोग किया। राजपूत संघ की वीरता के बावजूद युद्ध बाबर के पक्ष में गया।
इस पराजय ने राणा सांगा की व्यापक योजना को गहरा आघात पहुंचाया। उनके सहयोगी केंद्रों को अब अलग-अलग दबाव का सामना करना था। चंदेरी इसी कारण अगले बड़े लक्ष्यों में शामिल हुई। बाबर के लिए मेदिनी राय को परास्त करना खानवा के बाद बचे हुए प्रभावशाली राजपूत प्रतिरोध को कमजोर करना था।
चंदेरी के समय सहायता क्यों नहीं पहुंच सकी
लोकप्रिय प्रश्न है कि यदि मेदिनी राय राणा सांगा के इतने निकट सहयोगी थे तो 1528 में चंदेरी की रक्षा के लिए बड़ी सहायता क्यों नहीं पहुंची। इसका उत्तर खानवा के बाद की परिस्थिति में है। राजपूत संघ बिखर चुका था, राणा सांगा स्वयं पहले जैसी सैन्य स्थिति में नहीं थे और बाबर तेजी से अपने विरोधी केंद्रों पर दबाव बना रहा था।
मेदिनी राय जानते थे कि राहत सेना की संभावना सीमित है। फिर भी उन्होंने चंदेरी छोड़ने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय केवल दुर्ग के प्रति लगाव नहीं था। चंदेरी उनके राज्य, प्रतिष्ठा और उस राजनीतिक विश्वास का प्रतीक थी जिसके आधार पर उन्होंने राणा सांगा के साथ वर्षों संघर्ष किया था। किला छोड़ना उनके लिए अपने पूरे राजनीतिक जीवन से पीछे हटना होता।
दो वीरों की साझी विरासत
राणा सांगा और मेदिनी राय की स्मृति राजपूत इतिहास में अलग-अलग भी जीवित है और साथ भी। एक ने अनेक राजपूत शक्तियों को जोड़ने का प्रयास किया, दूसरे ने मालवा और चंदेरी में उस व्यापक शक्ति को आधार दिया। दोनों की साझेदारी ने पश्चिमी मेवाड़ से पूर्वी मालवा तक राजनीतिक संबंध बनाया।
इस संबंध को केवल मित्रता की भावुक कहानी बना देना भी ठीक नहीं और केवल स्वार्थ की संधि कहना भी अधूरा है। उपलब्ध घटनाएं बताती हैं कि उनके बीच साझा हित, युद्ध में सहयोग और दीर्घकालिक विश्वास तीनों थे। विजेता बाबर का वृत्तांत भी मेदिनी राय को राणा सांगा के प्रतिष्ठित सरदार के रूप में स्वीकार करता है।
चंदेरी के अंतिम युद्ध में राणा सांगा उपस्थित नहीं थे, पर उस युद्ध की पृष्ठभूमि में उनका गठबंधन मौजूद था। मेदिनी राय का प्रतिरोध खानवा के बाद भी जीवित राजपूत स्वाभिमान का प्रतीक बना। यही कारण है कि दोनों नामों को साथ पढ़ना केवल इतिहास की आवश्यकता नहीं, उस युग की राजनीतिक समझ की कुंजी भी है।
घटनाओं के अध्ययन में बाबरनामा का अंग्रेजी अनुवाद और मुगल साम्राज्य के इतिहास पर उपलब्ध ग्रंथ महत्वपूर्ण आधार हैं। चंदेरी के स्थल और दुर्ग की जानकारी मध्य प्रदेश पर्यटन से देखी जा सकती है।
टिप्पणियां 0