गढ़कुंडर: जहां रहस्य से कहीं बड़ी है इतिहास की कहानी
निवाड़ी। बुंदेलखंड की पहाड़ियों और जंगलों के बीच आज भी एक ऐसा दुर्ग खड़ा है, जिसे दूर से देखने पर उसकी विशालता आकर्षित करती है और भीतर प्रवेश करते ही उसकी संरचना हैरान कर देती है। यह है मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित गढ़कुंडर का किला।
गढ़कुंडर को अक्सर उसकी भूल-भुलैया जैसी बनावट, भूमिगत हिस्सों और सामरिक संरचना के कारण भारत के रहस्यमयी किलों में गिना जाता है। इंटरनेट पर भी “गढ़कुंडर का रहस्य” और “Garh Kundar Fort History” जैसे विषयों पर बड़ी संख्या में लोग जानकारी तलाशते हैं।
लेकिन गढ़कुंडर का वास्तविक आकर्षण केवल उसके बंद रास्तों या भूमिगत कक्षों में नहीं है।
इस दुर्ग की सबसे महत्वपूर्ण कहानी उन खंगार शासकों से जुड़ी है, जिन्होंने मध्यकालीन बुंदेलखंड में गढ़कुंडर को अपनी सत्ता का केंद्र बनाया। आज भी सरकारी दस्तावेज और प्रशासनिक इतिहास-विवरण गढ़कुंडर क्षेत्र में खंगारों की राजनीतिक उपस्थिति को दर्ज करते हैं।
टीकमगढ़ जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के ऐतिहासिक विवरण में स्पष्ट रूप से लिखा है कि खंगारों ने विशेष रूप से गढ़कुंडर के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार रखा था।
यही एक उल्लेख गढ़कुंडर की उस ऐतिहासिक पहचान की ओर ध्यान खींचता है, जो लोकप्रिय पर्यटन कथाओं के पीछे कई बार दब जाती है—गढ़कुंडर खंगार राजवंश की सत्ता और राजधानी का प्रमुख केंद्र था।
पहाड़ी पर बसा वह दुर्ग, जिसे जीतना आसान नहीं था
गढ़कुंडर का किला वर्तमान निवाड़ी जिले में ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। चारों ओर पहाड़ियों और वन क्षेत्र से घिरे इस दुर्ग की प्राकृतिक स्थिति ही इसे असाधारण सामरिक सुरक्षा प्रदान करती थी।
निवाड़ी जिला प्रशासन भी गढ़कुंडर को ऊंची पहाड़ी और प्राकृतिक पहाड़ियों व जंगलों से घिरा ऐतिहासिक दुर्ग बताता है। इसी सरकारी विवरण में किले के साथ महाराजा खेतसिंह खंगार तथा खंगारों की कुलदेवी मानी जाने वाली गजानन माता के प्राचीन मंदिर का उल्लेख भी मिलता है।
गढ़कुंडर की बनावट ऐसी है कि किसी अनजान व्यक्ति के लिए इसके रास्तों को समझना आसान नहीं होता। विशाल केंद्रीय प्रांगण, प्रहरी स्थल, संकरे मार्ग, अंदरूनी कक्ष और नीचे उतरती संरचनाएं इसे सामान्य राजमहल से अलग पहचान देती हैं।
यही कारण है कि गढ़कुंडर को देखने वाला व्यक्ति जल्द ही समझ जाता है कि यह केवल राजपरिवार के निवास के लिए खड़ी की गई इमारत नहीं थी। इसकी संरचना में राजसत्ता और सुरक्षा—दोनों आवश्यकताओं का स्पष्ट मेल दिखाई देता है।
आज प्रचलित विवरणों में किले को पांच मंजिला बताया जाता है, जिसमें तीन स्तर भूमि के ऊपर और दो भूमिगत हैं। इसकी जटिल आंतरिक संरचना तथा सुरक्षा-केंद्रित डिजाइन ने ही गढ़कुंडर को “रहस्यमयी किले” की लोकप्रिय पहचान दी है।
महाराजा खेतसिंह खंगार के साथ शुरू होता है गढ़कुंडर का सबसे गौरवशाली अध्याय
गढ़कुंडर किला का इतिहास पढ़ते समय बारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध का दौर विशेष महत्व रखता है। यही वह समय था जब बुंदेलखंड की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही थी।
चन्देल शक्ति के प्रभाव में कमी और उत्तर भारत में बदलते सत्ता-समीकरणों के बीच नए क्षेत्रीय राजनीतिक केंद्र उभर रहे थे। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में महाराजा खेतसिंह खंगार का नाम गढ़कुंडर से जुड़ता है।
खेतसिंह खंगार को पृथ्वीराज चौहान की सैन्य परंपरा से जोड़ने वाले विवरण लंबे समय से प्रचलित हैं। गढ़कुंडर में उनकी भूमिका केवल एक सैनिक अधिकारी तक सीमित नहीं रही; आगे चलकर यही स्थान खंगार राजसत्ता के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गढ़कुंडर और खंगारों का संबंध केवल समुदाय में चली आ रही स्मृति तक सीमित नहीं है।
मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित एक CAMPA मूल्यांकन रिपोर्ट में पुराने Kundar Fort यानी Garh Kundar को खंगारों द्वारा निर्मित बताया गया है और 1180 से 1347 ई. तक इसे Khangar rulers की राजधानी के रूप में दर्ज किया गया है।
यह उल्लेख गढ़कुंडर के इतिहास में खंगार राजवंश की स्थिति को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।
क्या गढ़कुंडर का किला खंगारों ने बनवाया था?
गढ़कुंडर से जुड़ा सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल है—गढ़कुंडर का किला किसने बनवाया?
इस प्रश्न का उत्तर गढ़कुंडर की अलग-अलग ऐतिहासिक अवस्थाओं को समझे बिना नहीं दिया जा सकता।
इस भूभाग पर खंगार शासन से पहले चन्देलों की राजनीतिक उपस्थिति रही थी और कुछ ऐतिहासिक विवरण यहां पहले से एक दुर्गीय संरचना या जिनागढ़ नामक गढ़ के अस्तित्व की बात करते हैं। लेकिन जिस गढ़कुंडर ने राजधानी, राजदरबार और खंगार राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में पहचान बनाई, उसका इतिहास खंगार शासन के साथ गहराई से जुड़ा है।
टीकमगढ़ जिला प्रशासन खंगारों के गढ़कुंडर क्षेत्र पर अधिकार का उल्लेख करता है, जबकि CAMPA से संबंधित सरकारी रिपोर्ट गढ़कुंडर को खंगारों द्वारा निर्मित और उनकी राजधानी बताती है।
इसलिए गढ़कुंडर को केवल एक पूर्ववर्ती चन्देल दुर्ग कहकर उसकी कहानी समाप्त कर देना इतिहास की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।
गढ़कुंडर का राजनीतिक उत्कर्ष उस काल में दिखाई देता है जब खंगार शासकों ने इसे अपनी राजधानी बनाकर क्षेत्र में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
राजधानी थी गढ़कुंडर, केवल चौकी नहीं
इतिहास में “राजधानी” शब्द का अर्थ महज किसी राजा के रहने की जगह नहीं होता।
राजधानी वह स्थान होती है जहां से शासन चलता है, सेनाएं नियंत्रित होती हैं, आसपास के क्षेत्र पर राजनीतिक अधिकार स्थापित किया जाता है और शासक वंश की प्रतिष्ठा आकार लेती है।
गढ़कुंडर खंगारों के लिए यही भूमिका निभाता दिखाई देता है।
इसीलिए गढ़कुंडर का महत्व खंगार इतिहास में किसी सामान्य किले से कहीं अधिक है। यह मध्यकालीन बुंदेलखंड में खंगार राजसत्ता का भौतिक प्रतीक बन गया।
1180 से 1347 ई. तक गढ़कुंडर को खंगार राजाओं की राजधानी बताने वाला सरकारी रिपोर्ट का उल्लेख इस लंबे राजनीतिक अध्याय की ओर संकेत करता है।
करीब डेढ़ शताब्दी से अधिक समय तक किसी स्थान का एक राजवंश की राजधानी के रूप में बने रहना अपने आप में उस सत्ता की राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय प्रभाव का प्रमाण है।
गढ़कुंडर की मजबूत दीवारें आज भी उसी युग की स्मृति अपने भीतर समेटे खड़ी हैं।
महाराजा खूब सिंह खंगार और दुर्ग के विस्तार की परंपरा
खंगार इतिहास की परंपराओं में महाराजा खूब सिंह खंगार का नाम भी गढ़कुंडर के विकास और सुदृढ़ीकरण के साथ प्रमुखता से लिया जाता है।
क्षेत्रीय इतिहास-विवरण खेतसिंह खंगार के बाद खंगार शासकों द्वारा गढ़कुंडर की सैन्य और राजकीय संरचना को आगे विकसित करने का उल्लेख करते हैं।
आज दिखाई देने वाला गढ़कुंडर एक साधारण पहाड़ी दुर्ग नहीं है। इसके भीतर राजकीय भवन, सैनिक व्यवस्था, केंद्रीय प्रांगण, प्रहरी स्थल और ऐसी संरचनाएं दिखाई देती हैं जिन्हें स्पष्ट रूप से सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।
बाहरी व्यक्ति को देखते हुए स्वयं अंदर से अदृश्य बने रहने जैसी स्थापत्य विशेषताओं का भी विवरण मिलता है। किले का केंद्रीय प्रांगण और बहुस्तरीय संरचना इसकी सैन्य योजना को और विशिष्ट बनाती है।
यह स्थापत्य उस दौर के खंगार शासकों की केवल युद्ध क्षमता नहीं, बल्कि राजकीय संगठन और सामरिक सोच की ओर भी संकेत करता है।
बुंदेलखंड की राजनीति में खंगार कोई फुटनोट नहीं थे
गढ़कुंडर की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है।
भारतीय इतिहास की लोकप्रिय पुस्तकों में बड़े साम्राज्यों और प्रसिद्ध राजवंशों पर विस्तृत चर्चा मिलती है, जबकि क्षेत्रीय शक्तियों को अक्सर कुछ पंक्तियों में समेट दिया जाता है।
खंगार राजवंश भी लंबे समय तक इसी स्थिति का सामना करता रहा है।
लेकिन स्वयं मध्य प्रदेश सरकार के टीकमगढ़ जिला प्रशासन का ऐतिहासिक विवरण बताता है कि खंगारों ने इस क्षेत्र, विशेषकर गढ़कुंडर के आसपास, सत्ता स्थापित की थी। बाद में इसी क्षेत्र में बुंदेला शक्ति के उभार को खंगारों के पतन से जोड़ा गया है।
यह छोटी बात नहीं है।
किसी राजनीतिक शक्ति का पतन तभी दर्ज किया जाता है, जब उससे पहले उसकी अपनी सत्ता मौजूद रही हो।
गढ़कुंडर इस दृष्टि से खंगार इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्य बनकर सामने आता है—एक राजधानी, एक दुर्ग और एक ऐसा राजनीतिक केंद्र जिसके नियंत्रण को लेकर आने वाले समय में संघर्ष हुए।
खंगार-बुन्देला संघर्ष: सत्ता परिवर्तन का निर्णायक अध्याय
गढ़कुंडर का इतिहास केवल निर्माण और राजवैभव की कहानी नहीं है। इसकी दीवारों ने सत्ता के लिए हुए संघर्ष भी देखे।
खंगारों और बुन्देलों के बीच गढ़कुंडर के नियंत्रण को लेकर हुए संघर्ष का उल्लेख क्षेत्रीय इतिहास, साहित्य और बुंदेलखंड की लोकस्मृति में व्यापक रूप से मिलता है।
विवाह प्रस्ताव, राजनीतिक तनाव और विश्वासघात से जुड़ी प्रसिद्ध कथा भी इसी संघर्ष की स्मृति के साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आई है।
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक वृन्दावनलाल वर्मा ने इसी ऐतिहासिक परिवेश को अपने चर्चित उपन्यास ‘गढ़ कुण्डार’ का आधार बनाया। साहित्य इतिहास का विकल्प नहीं होता, लेकिन किसी घटना की सामाजिक स्मृति को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम अवश्य बनता है।
टीकमगढ़ जिला प्रशासन भी खंगारों के बाद क्षेत्र में बुंदेला शक्ति के उभार का उल्लेख करता है।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल दो राजपरिवारों का निजी विवाद मानना उचित नहीं होगा।
यह वास्तव में बुंदेलखंड में सत्ता के एक बड़े परिवर्तन की कहानी थी।
1347: खंगार राजधानी के इतिहास में दर्ज एक निर्णायक मोड़
गढ़कुंडर से संबंधित सरकारी रिपोर्ट में 1347 ई. तक इसे खंगार शासकों की राजधानी बताया गया है।
इसी कालखंड के आसपास गढ़कुंडर के साथ तुगलक सत्ता के संघर्ष की परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं।
खंगार समाज की ऐतिहासिक स्मृति में यह समय महाराजा मान सिंह खंगार, राजपरिवार और खंगार योद्धाओं के अंतिम बड़े प्रतिरोध से जुड़ा है। राजकुमारी केसर देई और जौहर की कथा भी इसी स्मृति में अत्यंत सम्मान के साथ जीवित है।
गढ़कुंडर से जुड़ी इन वीरगाथाओं ने किले को केवल एक राजनीतिक राजधानी नहीं रहने दिया; यह खंगार समाज में त्याग, वीरता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गया।
यही कारण है कि सदियां बीत जाने के बाद भी गढ़कुंडर का नाम आते ही खंगार इतिहास में केवल एक किला नहीं, बल्कि एक पूरे राजवंश की स्मृति सामने खड़ी हो जाती है।
आखिर गढ़कुंडर इतना रहस्यमयी क्यों है?
इतिहास से अलग हटकर भी गढ़कुंडर की संरचना लोगों को आकर्षित करती है।
दूर से दिखाई देने और नजदीक पहुंचते-पहुंचते पहाड़ियों के बीच ओझल हो जाने की इसकी विशेषता अक्सर यात्रियों के अनुभवों में दर्ज की जाती है। अंदर पहुंचने पर कई दिशाओं में जाते रास्ते, नीचे उतरते हिस्से और छिपे हुए कक्ष इसे भूल-भुलैया जैसा अनुभव देते हैं।
किले का निर्माण स्थानीय पत्थर के उपयोग से किया गया है और केंद्रीय प्रांगण के चारों ओर उसका राजकीय परिसर विकसित दिखाई देता है। सुरक्षा के लिए बने प्रहरी स्थल तथा बाहर से भीतर की गतिविधियों को देख पाना कठिन बनाने वाली संरचना इसके सामरिक चरित्र को मजबूत करती है।
लेकिन गढ़कुंडर से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य शायद भूमिगत रास्ते नहीं हैं।
बड़ा प्रश्न यह है कि इतनी लंबी अवधि तक खंगार राजवंश की राजधानी रहे इस ऐतिहासिक स्थल और उसके शासकों पर राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत इतनी कम चर्चा क्यों हुई?
यही वह सवाल है जो गढ़कुंडर को आज भी नए शोध का विषय बनाता है।
सरकारी अभिलेखों में स्पष्ट दिखाई देता है खंगार संबंध
गढ़कुंडर और खंगार राजवंश के संबंध को समझने के लिए इंटरनेट पर मौजूद किसी एक लेख पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है।
मध्य प्रदेश सरकार के टीकमगढ़ जिला प्रशासन का इतिहास स्पष्ट करता है कि खंगारों का गढ़कुंडर के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार था।
वर्तमान निवाड़ी जिला प्रशासन की वेबसाइट गढ़कुंडर में महाराजा खेतसिंह खंगार और उनके द्वारा निर्मित माने जाने वाले गजानन माता मंदिर का उल्लेख करती है।
वहीं मध्य प्रदेश State CAMPA से संबंधित मूल्यांकन रिपोर्ट गढ़कुंडर को खंगारों द्वारा निर्मित बताते हुए इसे 1180 से 1347 तक खंगार शासकों की राजधानी दर्ज करती है।
तीनों को साथ रखकर देखने पर तस्वीर काफी स्पष्ट हो जाती है—
गढ़कुंडर और खंगार राजवंश का संबंध किसी आधुनिक दावे का परिणाम नहीं है; यह सरकारी और ऐतिहासिक विवरणों में दर्ज एक स्थापित क्षेत्रीय ऐतिहासिक संबंध है।
खंगार क्षत्रिय समाज के लिए गढ़कुंडर का अर्थ
हर ऐतिहासिक राजवंश की स्मृति किसी न किसी भूभाग, राजधानी या दुर्ग के साथ स्थायी रूप से जुड़ जाती है।
मेवाड़ के इतिहास में चित्तौड़ का नाम आते ही वहां के राजपूत शासकों की स्मृति जाग उठती है। जैसलमेर की पहचान भाटी राजवंश से अलग करके नहीं देखी जा सकती।उसी तरह गढ़कुंडर खंगार राजवंश की ऐतिहासिक चेतना का प्रमुख केंद्र है।यह तुलना किसी दूसरे राजवंश के इतिहास को छोटा करने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि किसी समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति में उसकी राजधानी का क्या स्थान होता है।
खंगार क्षत्रिय समाज के लिए गढ़कुंडर उस युग की स्मृति है जब उनके पूर्वज केवल किसी सेना का हिस्सा नहीं थे, बल्कि एक राजनीतिक सत्ता के रूप में अपनी राजधानी से शासन कर रहे थे।
यही कारण है कि गढ़कुंडर की रक्षा केवल किसी पुराने स्मारक की रक्षा नहीं है।
यह खंगार इतिहास की एक जीवित विरासत को सुरक्षित रखने का प्रश्न भी है।
इतिहास की किताबों से बाहर क्यों रह गया गढ़कुंडर का यह अध्याय?
यह प्रश्न नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत का मध्यकालीन इतिहास अत्यंत विस्तृत है। दिल्ली की सल्तनत, मुगल साम्राज्य और बड़े क्षेत्रीय राजवंशों के बीच अनेक स्थानीय और क्षेत्रीय शक्तियों का इतिहास सामान्य पाठ्यपुस्तकों में बहुत कम स्थान पा सका।
इसका परिणाम यह हुआ कि ऐसे कई राजवंश, जिन्होंने अपने क्षेत्रों में लंबे समय तक शासन किया, धीरे-धीरे मुख्यधारा की सार्वजनिक स्मृति से दूर होते गए।
गढ़कुंडर और खंगार राजवंश की कहानी भी इसी व्यापक समस्या की ओर ध्यान खींचती है।
जब सरकारी इतिहास स्वयं यह दर्ज करता है कि खंगारों का गढ़कुंडर क्षेत्र पर अधिकार था और सरकारी रिपोर्ट इसे उनके शासकों की राजधानी बताती है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस इतिहास पर और गंभीर शोध हो।
पुराने गजेटियर, अभिलेखागार, पुरातात्विक अध्ययन, वंशावलियां और स्थानीय स्रोत भविष्य में गढ़कुंडर के इतिहास की और परतें खोल सकते हैं।
गढ़कुंडर आज भी कह रहा है—अपने इतिहास को पहचानिए
सदियां बीत गईं। राजवंश बदल गए। बुंदेलखंड की राजनीतिक सीमाएं भी कई बार बदलीं।
लेकिन गढ़कुंडर आज भी उसी पहाड़ी पर खड़ा है।
उसकी दीवारें उस समय की स्मृति संजोए हुए हैं जब यहां खंगार राजाओं की राजधानी थी, जब यहां से सत्ता संचालित होती थी और जब इस दुर्ग की सुरक्षा खंगार योद्धाओं के हाथों में थी।
गढ़कुंडर इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उससे रहस्य और लोककथाएं जुड़ी हैं।
वह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक भूले-बिसरे राजनीतिक इतिहास की ओर इशारा करता है।
यह महाराजा खेतसिंह खंगार और उनके उत्तराधिकारियों की सत्ता की स्मृति है।
यह खंगार राजवंश की राजधानी की स्मृति है।
यह बुंदेलखंड के इतिहास में खंगार क्षत्रिय समाज की राजनीतिक उपस्थिति का प्रतीक है।
आज आवश्यकता इस इतिहास को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की नहीं, बल्कि पहले से उपलब्ध प्रमाणों और ऐतिहासिक स्रोतों को सामने लाने की है।
क्योंकि कई बार इतिहास को स्थापित करने के लिए नए दावे गढ़ने की आवश्यकता नहीं होती—
पुराने दस्तावेजों पर जमी धूल हटाना ही पर्याप्त होता है।
गढ़कुंडर उसी इतिहास की ओर नई पीढ़ी को बुला रहा है।
गढ़कुंडर किला: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गढ़कुंडर का किला कहां स्थित है?
गढ़कुंडर का किला मध्य प्रदेश के वर्तमान निवाड़ी जिले में स्थित है। यह ऐतिहासिक बुंदेलखंड क्षेत्र का महत्वपूर्ण पहाड़ी दुर्ग है।
गढ़कुंडर किस राजवंश की राजधानी था?
मध्य प्रदेश State CAMPA से संबंधित सरकारी रिपोर्ट में गढ़कुंडर को 1180 से 1347 ई. तक खंगार शासकों की राजधानी बताया गया है।
महाराजा खेतसिंह खंगार कौन थे?
महाराजा खेतसिंह खंगार गढ़कुंडर में खंगार सत्ता के उदय से जुड़े प्रमुख मध्यकालीन शासक थे। निवाड़ी जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में भी गढ़कुंडर के साथ उनका नाम दर्ज है।
क्या गढ़कुंडर का किला खंगारों ने बनवाया था?
मध्य प्रदेश State CAMPA से संबंधित एक सरकारी मूल्यांकन रिपोर्ट गढ़कुंडर को खंगारों द्वारा निर्मित बताती है और इसे 1180 से 1347 तक खंगार शासकों की राजधानी के रूप में दर्ज करती है। इस भूभाग पर खंगार काल से पहले चन्देल उपस्थिति के भी ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं।
गढ़कुंडर को रहस्यमयी किला क्यों कहा जाता है?
किले की बहुस्तरीय संरचना, भूमिगत हिस्से, जटिल रास्ते, प्राकृतिक पहाड़ियों के बीच उसकी स्थिति और दूर से दिखाई देने के बाद निकट पहुंचने पर कई स्थानों से ओझल होने जैसी स्थापत्य विशेषताओं के कारण इसे रहस्यमयी किला कहा जाता है।
गढ़कुंडर का खंगार क्षत्रिय समाज से क्या संबंध है?
गढ़कुंडर मध्यकाल में खंगार राजवंश की प्रमुख राजधानी और राजनीतिक सत्ता-केंद्र रहा। इसी कारण यह आज खंगार क्षत्रिय समाज की ऐतिहासिक विरासत, राजसत्ता और सामुदायिक स्मृति के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में गिना जाता है।
प्रमुख संदर्भ
District Administration Tikamgarh, Government of Madhya Pradesh — जिले के इतिहास में खंगारों द्वारा विशेष रूप से गढ़कुंडर के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार का उल्लेख।
District Administration Niwari, Government of Madhya Pradesh — Garh Kundar, महाराजा खेतसिंह खंगार और गजानन माता मंदिर से संबंधित विवरण।
Madhya Pradesh State CAMPA Evaluation Report — गढ़कुंडर को खंगारों द्वारा निर्मित तथा 1180–1347 ई. तक खंगार शासकों की राजधानी बताने वाला उल्लेख।
District Census Handbooks, Tikamgarh — क्षेत्र के ऐतिहासिक और प्रशासनिक संदर्भों के लिए।
बुंदेलखंड के पुराने गजेटियर और क्षेत्रीय इतिहास ग्रंथ।
वृन्दावनलाल वर्मा — गढ़ कुण्डार; ऐतिहासिक परिवेश पर आधारित साहित्यिक कृति।
संपादकीय नीति: KhangarKshatriya.com का उद्देश्य खंगार क्षत्रिय समाज के इतिहास, राजवंश, ऐतिहासिक स्थलों और सांस्कृतिक विरासत से संबंधित सामग्री को सरकारी अभिलेखों, गजेटियरों, अकादमिक शोध, क्षेत्रीय इतिहास और संरक्षित सामाजिक स्मृतियों के आधार पर नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। लेख का उद्देश्य किसी अन्य राजवंश या समुदाय के ऐतिहासिक योगदान को कम करना नहीं, बल्कि खंगार राजवंश से जुड़े उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों को व्यवस्थित रूप से सामने लाना है।
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