बुन्देलखंड का भूला हुआ राजवंश: गढ़कुंडर और खंगार राजवंश का इतिहास
गढ़कुंडर की पहाड़ियों में आज भी उस सत्ता के निशान मौजूद हैं जिसने मध्यकालीन बुन्देलखंड के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। सरकारी दस्तावेज खंगारों की गढ़कुंडर क्षेत्र में सत्ता दर्ज करते हैं, फिर भी सामान्य इतिहास-विमर्श में यह अध्याय आज भी अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
बुन्देलखंड का इतिहास सामने आते ही कुछ नाम लगभग स्वतः स्मृति में उभरने लगते हैं। खजुराहो और कालिंजर के साथ चन्देल राजवंश, ओरछा के साथ बुन्देला शासक, महाराजा छत्रसाल और लोकगाथाओं में अमर आल्हा-ऊदल।
इन सबके बीच एक और राजवंश है, जिसका संबंध बुन्देलखंड की धरती से केवल सामाजिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि सीधे राजनीतिक सत्ता से रहा है।
वह है खंगार राजवंश।
मध्य प्रदेश के वर्तमान निवाड़ी जिले में स्थित गढ़कुंडर आज भी उस इतिहास का सबसे बड़ा साक्षी है। पहाड़ियों और जंगलों से घिरा यह दुर्ग लंबे समय तक खंगार सत्ता का केंद्र रहा। मध्य प्रदेश सरकार के टीकमगढ़ जिला प्रशासन का आधिकारिक इतिहास भी स्पष्ट शब्दों में दर्ज करता है कि खंगारों का इस क्षेत्र, विशेष रूप से गढ़कुंडर के आसपास, अधिकार था। उसी सरकारी विवरण में आगे बुन्देला शक्ति के उदय के साथ खंगारों के पतन का उल्लेख मिलता है।
ऐसे में प्रश्न स्वाभाविक है—यदि गढ़कुंडर में खंगार सत्ता सरकारी इतिहास का हिस्सा है, तो बुन्देलखंड के लोकप्रिय इतिहास में इस राजवंश की चर्चा इतनी कम क्यों है?
यही प्रश्न खंगार राजवंश के इतिहास को केवल एक समुदाय का विषय न बनाकर पूरे बुन्देलखंड के इतिहास का महत्वपूर्ण विषय बना देता है।
गढ़कुंडर की पहाड़ियों से उभरी एक राजनीतिक शक्ति
गढ़कुंडर मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में स्थित है। प्राकृतिक पहाड़ियों, जंगल और कठिन भूगोल से घिरे इस क्षेत्र को देखकर ही समझा जा सकता है कि मध्यकालीन शासकों के लिए इसका सामरिक महत्व कितना बड़ा रहा होगा।
गढ़कुंडर की पहचान केवल एक पुराने किले के रूप में नहीं थी। समय के साथ यह सत्ता का केंद्र बना और यहीं से खंगार राजवंश की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक स्मृति जुड़ती है।
महाराजा खेतसिंह खंगार का नाम गढ़कुंडर के इतिहास में विशेष रूप से सामने आता है। वर्तमान निवाड़ी जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट गढ़कुंडर के विवरण में महाराजा खेतसिंह खंगार का उल्लेख करती है। प्रशासनिक विवरण में यहां स्थित गजानन माता के प्राचीन मंदिर को भी महाराजा खेतसिंह खंगार से जोड़ा गया है और गजानन माता को खंगारों की कुलदेवी के रूप में वर्णित किया गया है।
यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे गढ़कुंडर, महाराजा खेतसिंह खंगार और खंगार राजवंश के बीच संबंध केवल आधुनिक सामाजिक स्मृति तक सीमित नहीं रहता। वह सरकारी रिकॉर्ड में भी दिखाई देता है।
बुन्देलखंड के मध्यकालीन इतिहास में जब चन्देल शक्ति कमजोर हो रही थी और क्षेत्रीय सत्ता-समीकरण बदल रहे थे, तब गढ़कुंडर जैसे दुर्गों का महत्व बढ़ना स्वाभाविक था। इसी बदलते राजनीतिक परिवेश में खंगार शक्ति का उदय हुआ और गढ़कुंडर उनके शासन की पहचान बन गया।
गढ़कुंडर केवल दुर्ग नहीं, खंगार सत्ता की राजधानी था
किसी राजवंश के इतिहास को समझने में उसकी राजधानी सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक होती है।
राजधानी केवल राजा का निवास नहीं होती। वहीं से प्रशासन चलता है, सैन्य निर्णय लिए जाते हैं, आसपास के भूभाग पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है और राजवंश की राजनीतिक पहचान विकसित होती है।
गढ़कुंडर ने खंगारों के लिए यही भूमिका निभाई।
टीकमगढ़ नगर पालिका की वर्तमान आधिकारिक वेबसाइट गढ़कुंडर को खंगारों द्वारा निर्मित किला बताते हुए दर्ज करती है कि यह 1180 से 1347 ईस्वी तक खंगार शासकों की राजधानी रहा।
यह लगभग डेढ़ शताब्दी से अधिक लंबा कालखंड है।
इतनी लंबी अवधि किसी क्षणिक सैन्य उपस्थिति का संकेत नहीं देती। यह एक स्थापित क्षेत्रीय राजनीतिक सत्ता की ओर संकेत करती है, जिसकी अपनी राजधानी थी और जिसका प्रभाव गढ़कुंडर के आसपास के भूभाग पर मौजूद था।
मध्य प्रदेश सरकार के टीकमगढ़ जिला प्रशासन का विवरण भी इसी व्यापक ऐतिहासिक तस्वीर को मजबूत करता है। उसमें लिखा है कि चन्देलों के बाद इस क्षेत्र में खंगारों की उपस्थिति रही और उन्होंने विशेष रूप से गढ़कुंडर के आसपास के क्षेत्र पर अधिकार रखा। बाद में बुन्देला शक्ति के उदय ने खंगार सत्ता को पीछे धकेला।
इस आधार पर खंगार राजवंश को बुन्देलखंड के इतिहास में किसी दूसरे राजवंश की कहानी के छोटे प्रसंग के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है।
उनकी अपनी राजनीतिक सत्ता थी और गढ़कुंडर उसका केंद्र था।
महाराजा खेतसिंह खंगार और गढ़कुंडर का नया अध्याय
खंगार इतिहास की चर्चा महाराजा खेतसिंह खंगार के बिना अधूरी है।
क्षेत्रीय ऐतिहासिक विवरणों में उन्हें पृथ्वीराज चौहान की सैन्य परंपरा से जोड़ा जाता है। उनके नेतृत्व में गढ़कुंडर खंगार शक्ति का प्रमुख केंद्र बना और आगे चलकर इसी आधार पर खंगार राजवंश की कई पीढ़ियों ने यहां शासन किया।
महाराजा खेतसिंह खंगार की स्मृति आज भी केवल पुराने ग्रंथों तक सीमित नहीं है।
17 फरवरी 2023 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांदा में महाराजा खेतसिंह खंगार जूदेव की प्रतिमा का अनावरण किया। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक चैनल ने इस समारोह का रिकॉर्ड प्रकाशित किया है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में खेतसिंह खंगार को 12वीं शताब्दी के वीर योद्धा के रूप में स्मरण करते हुए पृथ्वीराज चौहान के साथ उनके सैन्य संबंध का उल्लेख किया।
आठ सौ वर्ष से अधिक समय बाद किसी मध्यकालीन योद्धा की सार्वजनिक प्रतिमा स्थापित होना केवल स्मारक निर्माण का विषय नहीं है। यह बताता है कि उनकी ऐतिहासिक स्मृति बुन्देलखंड के समाज में आज भी जीवित है।
गढ़कुंडर और खेतसिंह खंगार का संबंध इसी सामाजिक और ऐतिहासिक स्मृति की केंद्रीय कड़ी है।
आखिर गढ़कुंडर का निर्माण किसने कराया?
गढ़कुंडर के इतिहास का यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है।
इस भूभाग का इतिहास खंगार सत्ता से पहले का भी है। चन्देलों के समय यहां सैन्य गतिविधियों और पूर्ववर्ती दुर्गीय संरचना से जुड़े उल्लेख मिलते हैं। इसलिए गढ़कुंडर के संपूर्ण स्थापत्य को किसी एक समय और एक ही शासक से जोड़कर देखना मध्यकालीन दुर्गों के विकास की जटिल प्रक्रिया को बहुत सरल बना देना होगा।
लेकिन यहां एक तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिस गढ़कुंडर को बाद के इतिहास में एक शक्तिशाली राजधानी, राजकीय केंद्र और खंगार सत्ता की पहचान के रूप में देखा जाता है, उसका उत्कर्ष खंगार शासन के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है।
टीकमगढ़ नगर पालिका इसे खंगारों द्वारा निर्मित बताती है और 1180 से 1347 तक खंगार शासकों की राजधानी दर्ज करती है। मध्य प्रदेश पर्यटन से जुड़े विस्तृत ऐतिहासिक विवरण में भी महाराजा खेतसिंह खंगार द्वारा यहां अपनी राजधानी स्थापित करने और बाद की पीढ़ियों में किले को सुदृढ़ किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
इसलिए गढ़कुंडर की पहचान को केवल किसी पूर्ववर्ती दुर्ग से जोड़कर समाप्त कर देना उसकी राजनीतिक यात्रा का अधूरा वर्णन होगा।
गढ़कुंडर की सबसे प्रभावशाली ऐतिहासिक पहचान उस दौर से बनती है जब वह खंगार राजवंश की राजधानी था।
बुन्देलखंड की राजनीति में खंगार सत्ता का महत्व
बुन्देलखंड के राजवंशों की चर्चा करते समय अक्सर इतिहास एक सीधी रेखा की तरह प्रस्तुत किया जाता है—चन्देलों के बाद बुन्देला शक्ति का उदय।
लेकिन वास्तविक राजनीतिक इतिहास इससे अधिक जटिल था।
टीकमगढ़ जिला प्रशासन का इतिहास स्वयं चन्देलों के बाद खंगारों की क्षेत्रीय उपस्थिति और उसके बाद बुन्देला शक्ति के उदय का उल्लेख करता है।
इस क्रम को गंभीरता से पढ़ने पर खंगार राजवंश की स्थिति अधिक स्पष्ट होती है।
खंगार उस राजनीतिक परिवर्तन के बीच मौजूद एक स्वतंत्र शक्ति थे जिसने चन्देल प्रभुत्व के कमजोर होने के बाद गढ़कुंडर क्षेत्र में अपना स्थान बनाया। बाद में बुन्देलों का उभार इसी क्षेत्रीय सत्ता-संघर्ष का अगला अध्याय बना।
यानी बुन्देलखंड के मध्यकालीन इतिहास में खंगार काल कोई खाली जगह नहीं था।
वह एक वास्तविक राजनीतिक चरण था।
गढ़कुंडर इसकी सबसे बड़ी निशानी है।
खंगार-बुन्देला संघर्ष और सत्ता परिवर्तन की स्मृति
गढ़कुंडर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में खंगार और बुन्देला शक्तियों के बीच संघर्ष का प्रसंग आता है।
इस संघर्ष की स्मृति बुन्देलखंड की मौखिक परंपराओं, क्षेत्रीय इतिहास और साहित्य में लंबे समय से मौजूद है। विवाह प्रस्ताव, राजनीतिक संबंध और बाद में हुए संघर्ष की कथा इस क्षेत्र की सामाजिक स्मृति में विशेष रूप से प्रसिद्ध रही है।
हिंदी साहित्यकार वृन्दावनलाल वर्मा का प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘गढ़ कुण्डार’ भी इसी राजनीतिक वातावरण और खंगार-बुन्देला संबंधों को साहित्यिक रूप में सामने लाता है।
इतिहास और साहित्य का स्वरूप अलग होता है, लेकिन साहित्य की लंबी परंपरा यह अवश्य बताती है कि गढ़कुंडर का सत्ता-संघर्ष बुन्देलखंड की सामूहिक स्मृति में कितना गहरा बैठा हुआ था।
सरकारी इतिहास इस राजनीतिक परिवर्तन को अधिक संक्षिप्त ढंग से दर्ज करता है। टीकमगढ़ जिला प्रशासन स्पष्ट करता है कि क्षेत्र में बढ़ती बुन्देला शक्ति के परिणामस्वरूप खंगारों का पतन हुआ।
यानी गढ़कुंडर की कहानी केवल एक किले के स्वामित्व की कहानी नहीं है।
यह मध्यकालीन बुन्देलखंड में सत्ता के हस्तांतरण की कहानी है।
जब एक राजवंश मुख्यधारा के इतिहास में पीछे छूट गया
यहां से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
यदि खंगारों का गढ़कुंडर के आसपास शासन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है, यदि गढ़कुंडर को उनकी राजधानी कहा गया है, यदि महाराजा खेतसिंह खंगार का उल्लेख आज भी जिला प्रशासन करता है—तो फिर सामान्य भारतीय पाठक खंगार राजवंश के बारे में इतना कम क्यों जानता है?
इसका उत्तर किसी एक राजवंश या समुदाय पर आरोप लगाने में नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास लेखन की प्रकृति में तलाशना अधिक उपयोगी है।
राष्ट्रीय स्तर के इतिहास में बड़े साम्राज्यों को स्वाभाविक रूप से अधिक स्थान मिला। दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य, मराठा शक्ति और बड़े क्षेत्रीय राजघरानों के बीच अनेक छोटी और मध्यम क्षेत्रीय शक्तियों का इतिहास स्थानीय गजेटियरों, वंशावलियों, जिला इतिहासों और क्षेत्रीय साहित्य तक सीमित रह गया।
समय के साथ जिस इतिहास को विद्यालय की किताबों, विश्वविद्यालयों और लोकप्रिय माध्यमों में अधिक दोहराया गया, वही सामान्य स्मृति का हिस्सा बनता गया।
खंगार राजवंश की कहानी इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण उदाहरण दिखाई देती है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा इतिहास किसी एक योजना के तहत मिटा दिया गया। लेकिन यह कहना पूरी तरह उचित है कि बुन्देलखंड के लोकप्रिय इतिहास में खंगार राजवंश को उसके राजनीतिक महत्व के अनुपात में व्यापक पहचान नहीं मिली।
यही कारण है कि आज गढ़कुंडर को दोबारा पढ़ने की आवश्यकता है।
गढ़कुंडर आज भी इतिहास के सामने खड़ा एक प्रश्न है
इतिहास के कई विवाद कागज पर चलते रहते हैं, लेकिन गढ़कुंडर का सबसे बड़ा महत्व यह है कि वह आज भी भौतिक रूप से मौजूद है।
पहाड़ी पर खड़ा विशाल दुर्ग किसी वंशावली की एक पंक्ति भर नहीं है।
वह मध्यकालीन सत्ता की संरचना था।
उसकी दीवारें सैन्य सुरक्षा के लिए थीं। उसके आंतरिक हिस्से राजकीय गतिविधियों के लिए बने थे। उसका भूगोल उसे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक केंद्र बनाता था।
आज गढ़कुंडर को अक्सर रहस्यमयी किले के रूप में प्रचारित किया जाता है। इसके भूमिगत भागों, भूल-भुलैया जैसे रास्तों और दूर से दिखाई देने के बाद पहाड़ियों के बीच ओझल हो जाने की संरचना को लेकर अनेक लोकप्रिय विवरण प्रकाशित होते हैं।
लेकिन यदि केवल रहस्य पर ध्यान दिया जाए और उस सत्ता को भुला दिया जाए जिसने इसे अपनी राजधानी बनाया, तो गढ़कुंडर की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा छूट जाता है।
गढ़कुंडर का वास्तविक महत्व उसकी रहस्यमयी बनावट जितना ही उसके राजनीतिक इतिहास में है।
और उस राजनीतिक इतिहास के केंद्र में खंगार राजवंश मौजूद है।
1180 से 1347 तक का कालखंड क्यों महत्वपूर्ण है
गढ़कुंडर के इतिहास में 1180 से 1347 ईस्वी तक का उल्लेख बार-बार सामने आता है।
टीकमगढ़ नगर पालिका का आधिकारिक विवरण गढ़कुंडर को इसी अवधि में खंगार शासकों की राजधानी बताता है।
यदि इस कालक्रम को आधार बनाया जाए तो खंगारों की गढ़कुंडर से जुड़ी राजनीतिक परंपरा लगभग 167 वर्षों तक फैली दिखाई देती है।
इतिहास में डेढ़ शताब्दी से अधिक का शासन कोई छोटा कालखंड नहीं होता।
इतनी अवधि में पीढ़ियां बदलती हैं, प्रशासनिक संरचनाएं विकसित होती हैं, सैन्य व्यवस्था मजबूत होती है और राजवंश की अपनी राजनीतिक पहचान तैयार होती है।
यही कारण है कि खंगार इतिहास की चर्चा केवल महाराजा खेतसिंह खंगार तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
गढ़कुंडर उस पूरे राजवंश और उसकी कई पीढ़ियों के शासन की कहानी कहता है।
खंगार क्षत्रिय समाज की ऐतिहासिक चेतना में महाराजा खूब सिंह खंगार सहित अन्य शासकों की स्मृतियां भी इसी लंबे गढ़कुंडर काल से जुड़ी हैं।
इस दिशा में पुराने जिला गजेटियरों, अभिलेखागारों, पुरातात्विक साक्ष्यों और विभिन्न वंशावलियों पर अधिक व्यवस्थित अकादमिक अध्ययन भविष्य में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने ला सकता है।
मुख्यधारा से बाहर रहा इतिहास समाप्त नहीं हो जाता
इतिहास की एक विशेषता है—उसे कुछ समय के लिए भुलाया जा सकता है, लेकिन उसके सभी निशान आसानी से समाप्त नहीं होते।
गढ़कुंडर का किला बचा रहा।
क्षेत्रीय परंपराएं बची रहीं।
महाराजा खेतसिंह खंगार की स्मृति बची रही।
सरकारी जिला इतिहास में खंगारों का उल्लेख बचा रहा।
और नई पीढ़ी के सामने इन्हीं बिखरे स्रोतों को एक साथ पढ़ने का अवसर अब पहले से कहीं अधिक है।
डिजिटल अभिलेखागार और सरकारी दस्तावेजों की ऑनलाइन उपलब्धता ने स्थानीय इतिहास के अध्ययन का तरीका बदल दिया है। जिन सूचनाओं को कभी पुराने गजेटियर या पुस्तकालय में तलाशना पड़ता था, उनमें से बड़ी संख्या अब सामान्य पाठक के लिए उपलब्ध होने लगी है।
इससे खंगार राजवंश जैसे क्षेत्रीय इतिहासों को नया अवसर मिला है।
अब किसी समुदाय को केवल मौखिक परंपरा के आधार पर अपना इतिहास बताने की आवश्यकता नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड, पुराने ग्रंथ, ऐतिहासिक शोध और मौजूद स्मारकों को एक साथ पढ़कर अधिक मजबूत ऐतिहासिक तस्वीर तैयार की जा सकती है।
महाराजा खेतसिंह खंगार की प्रतिमा और बदलती सार्वजनिक स्मृति
बांदा में वर्ष 2023 में महाराजा खेतसिंह खंगार की प्रतिमा का अनावरण इस बदलते वातावरण का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समारोह में महाराजा खेतसिंह खंगार की वीरता और 12वीं शताब्दी के सैन्य इतिहास में उनकी भूमिका का उल्लेख किया। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक चैनल पर कार्यक्रम का रिकॉर्ड आज भी उपलब्ध है।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि क्षेत्रीय इतिहास तभी व्यापक सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा बनता है जब वह पुस्तकों के बाहर भी दिखाई देने लगे।
स्मारक, शोध, डिजिटल अभिलेख, स्थानीय संग्रहालय और इतिहास पर सार्वजनिक चर्चा इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
गढ़कुंडर और महाराजा खेतसिंह खंगार के इतिहास के साथ भी यही प्रक्रिया अब अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।
खंगार इतिहास किसी दूसरे राजवंश के इतिहास का विरोध नहीं है
बुन्देलखंड की वास्तविक ऐतिहासिक समृद्धि इसी में है कि यहां अलग-अलग कालखंडों में अनेक राजवंशों ने अपनी छाप छोड़ी।
चन्देलों ने इस क्षेत्र को अद्वितीय स्थापत्य और शक्तिशाली राजनीतिक विरासत दी।
खंगारों ने गढ़कुंडर को अपनी सत्ता का केंद्र बनाया।
बुन्देलों ने बाद में ओरछा सहित अनेक महत्वपूर्ण राज्यों और स्थापत्य परंपराओं का विकास किया।
महाराजा छत्रसाल ने बुन्देलखंड के इतिहास को एक नया अध्याय दिया।
इनमें से किसी एक का इतिहास स्वीकार करने के लिए दूसरे का इतिहास कम करना आवश्यक नहीं है।
लेकिन संतुलित इतिहास की मांग यह अवश्य है कि प्रत्येक राजनीतिक शक्ति को उसके उपलब्ध प्रमाण और वास्तविक ऐतिहासिक महत्व के आधार पर स्थान दिया जाए।
इसी संदर्भ में खंगार राजवंश को बुन्देलखंड के मध्यकालीन इतिहास में उसका उचित स्थान देना आवश्यक है।
खंगार क्षत्रिय समाज के लिए गढ़कुंडर का वास्तविक महत्व
किसी समाज की पहचान केवल वर्तमान से नहीं बनती। उसके ऐतिहासिक स्थल, स्मृतियां और पुरानी राजधानियां भी सामूहिक चेतना का हिस्सा होती हैं।
खंगार क्षत्रिय समाज के लिए गढ़कुंडर का महत्व इसी कारण असाधारण है।
यह केवल पर्यटन स्थल नहीं है।
यह उस समय की स्मृति है जब खंगार शासकों की अपनी राजनीतिक सत्ता थी।
यह महाराजा खेतसिंह खंगार और उनके बाद की शासकीय परंपरा से जुड़ा स्थल है।
यह उस लंबे कालखंड का प्रतीक है जिसे सरकारी विवरण 1180 से 1347 ईस्वी तक खंगार शासकों की राजधानी के रूप में दर्ज करते हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह इतिहास आज भी खोजा जा सकता है।
उसके लिए किसी काल्पनिक गौरवगाथा की आवश्यकता नहीं है।
गढ़कुंडर मौजूद है।
सरकारी रिकॉर्ड मौजूद हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद हैं।
आवश्यकता केवल उन्हें व्यवस्थित रूप से पढ़ने, शोध करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की है।
बुन्देलखंड का इतिहास गढ़कुंडर के बिना अधूरा है
गढ़कुंडर की पहाड़ी पर खड़ा दुर्ग शायद अपने इतिहास के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता, लेकिन वह एक बात निर्विवाद रूप से याद दिलाता है—बुन्देलखंड का मध्यकालीन इतिहास केवल उन राजवंशों तक सीमित नहीं है जिनका नाम आज सबसे अधिक प्रसिद्ध है।
उसमें खंगारों का भी अध्याय है।
उस अध्याय में महाराजा खेतसिंह खंगार हैं।
उसमें गढ़कुंडर की राजधानी है।
उसमें सत्ता का उदय है, कई पीढ़ियों की शासन परंपरा है और बाद में क्षेत्र में बदलती राजनीतिक शक्तियों के साथ संघर्ष है।
आज जब बुन्देलखंड के इतिहास को नए सिरे से पढ़ने की आवश्यकता महसूस हो रही है, तब खंगार राजवंश को केवल सामुदायिक इतिहास के दायरे में रखना उचित नहीं होगा।
यह Bundelkhand history का हिस्सा है।
यह मध्य भारत के क्षेत्रीय राजनीतिक इतिहास का हिस्सा है।
और गढ़कुंडर उस इतिहास का आज भी मौजूद सबसे प्रभावशाली प्रतीक है।
इतिहास का कोई अध्याय केवल इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाता कि उसके बारे में कम लिखा गया।
कई बार इतिहास मिटता नहीं है—वह पुराने दस्तावेजों, भूले हुए स्मारकों और स्थानीय स्मृतियों के बीच बिखर जाता है।
गढ़कुंडर और खंगार राजवंश की कहानी ऐसे ही बिखरे हुए इतिहास को फिर से एक साथ पढ़ने का आमंत्रण है।
स्रोत और संपादकीय आधार
इस आलेख के लिए मध्य प्रदेश सरकार के जिला टीकमगढ़ और जिला निवाड़ी प्रशासन के वर्तमान ऐतिहासिक विवरण, टीकमगढ़ नगर पालिका में उपलब्ध गढ़कुंडर संबंधी जानकारी तथा उत्तर प्रदेश सरकार के 17 फरवरी 2023 के महाराजा खेतसिंह खंगार जूदेव प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम को प्राथमिक आधार के रूप में देखा गया है। टीकमगढ़ जिला प्रशासन स्पष्ट रूप से गढ़कुंडर के आसपास खंगारों की सत्ता दर्ज करता है, जबकि निवाड़ी जिला प्रशासन गढ़कुंडर के साथ महाराजा खेतसिंह खंगार की स्मृति को जोड़ता है।
KhangarKshatriya.com का उद्देश्य किसी अन्य राजवंश या समुदाय के ऐतिहासिक योगदान को कम करना नहीं, बल्कि खंगार राजवंश से संबंधित उपलब्ध सरकारी, ऐतिहासिक और क्षेत्रीय स्रोतों को व्यवस्थित रूप से पाठकों के सामने लाना है। जैसे-जैसे नए अभिलेखीय या पुरातात्विक स्रोत उपलब्ध होंगे, इस विषय पर शोध और अधिक समृद्ध हो सकता है।
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