प्राचीन काल / वंश एवं उत्पत्ति

खंगार क्षत्रिय: चन्द्रवंशी क्षत्रियों की गौरवशाली वंश परम्परा

Khangar Kshatriya: The Glorious Chandravanshi Kshatriya Lineage

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भगवान श्रीकृष्ण के कुल से चूड़ासमा राजवंश और चूड़ासमा राजवंश से खंगार क्षत्रिय — एक अखण्ड क्षत्रिय वंशावली का प्रामाणिक विवरण।

खंगार क्षत्रिय समाज भारत के उन गौरवशाली क्षत्रिय कुलों में से एक है जिनकी वंश-परम्परा सीधे चन्द्रवंश से जुड़ती है। चन्द्रवंश अर्थात् चन्द्रमा के वंश से उत्पन्न वह राजकुल जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। कुल से निकली यह धारा सौराष्ट्र (गुजरात) के शक्तिशाली चूड़ासमा राजवंश तक पहुँचती है, और चूड़ासमा राजवंश से ही खंगार क्षत्रिय समाज का उद्भव हुआ है।

चन्द्रवंश: क्षत्रियों का सबसे प्राचीन राजकुल

भारतीय क्षत्रिय परम्परा में दो महान राजवंश माने जाते हैं — सूर्यवंश और चन्द्रवंश। चन्द्रवंश की स्थापना चन्द्रमा के पुत्र बुध और इला से हुई। इसी वंश में राजा ययाति, राजा यदु, और उनके वंशज उत्पन्न हुए। भगवान श्रीकृष्ण इसी कुल के सर्वोच्च पुरुष थे। चन्द्रवंशी क्षत्रिय होने का अर्थ है कि खंगार समाज की वंश-धारा भारतवर्ष की सबसे प्राचीन और सबसे प्रतिष्ठित राजसी परम्परा से जुड़ती है।

चूड़ासमा राजवंश: सौराष्ट्र के सिंह

चन्द्रवंशी की एक शाखा ने सौराष्ट्र प्रायद्वीप (आज का काठियावाड़, गुजरात) में अपना राज्य स्थापित किया। ये थे चूड़ासमा — जिन्होंने लगभग नवीं शताब्दी से पन्द्रहवीं शताब्दी तक जूनागढ़ के प्रसिद्ध उपरकोट दुर्ग से शासन किया। चूड़ासमा राजा अपनी अदम्य वीरता के लिए विख्यात थे। उन्होंने अणहिलवाड़ा पाटन के शक्तिशाली चालुक्य (सोलंकी) शासकों से बार-बार लोहा लिया और सौराष्ट्र की स्वतन्त्रता की रक्षा की।

चूड़ासमा राजवंश के कुछ प्रमुख शासक:

रा' ग्रहरिपु — चूड़ासमा राज्य के संस्थापक, जिन्होंने जूनागढ़ में चूड़ासमा सत्ता की नींव रखी।

रा' खेंगार द्वितीय (शासनकाल 1098–1125 ई.) — चूड़ासमा इतिहास के सर्वाधिक शूरवीर राजा। उनकी वीरता और रणकदेवी की प्रेमगाथा आज भी गुजरात में गाई जाती है। सिद्धराज जयसिंह के विरुद्ध उनका अन्तिम युद्ध राजपूती शौर्य का प्रतीक है।

रा' नोघन तृतीय (शासनकाल 1125–1140 ई.) — सोलंकी आक्रमण के बाद बिखरे हुए चूड़ासमा राज्य को पुनर्स्थापित करने वाले दृढ़ शासक।

रा' कावट द्वितीय (शासनकाल 1140–1152 ई.) — जूनागढ़ के राजा, और खंगार राजवंश के संस्थापक महाराजा खेतसिंह खंगार के पिता। खंगार समुदाय के वहीवंचा (भाट) अभिलेखों में इनका नाम "राजा कटव-2" के रूप में सुरक्षित है।

चूड़ासमा से खंगार: वंश-धारा का प्रवाह

रा' कावट द्वितीय की मृत्यु 1152 ई. में हुई। उस समय उनके पुत्र खेतसिंह मात्र 12 वर्ष के थे। जूनागढ़ का सिंहासन एक अन्य वरिष्ठ राजकुमार रा' जयसिंह को प्राप्त हुआ। राजपूत परम्परा के अनुसार, जो राजकुमार सिंहासन के उत्तराधिकारी नहीं होते थे, वे अन्य राज्यों में जाकर अपनी वीरता से नई राजसत्ता स्थापित करते थे। युवा खेतसिंह ने भी यही मार्ग चुना। वे सौराष्ट्र छोड़कर उत्तर भारत की ओर बढ़े और अजमेर में पृथ्वीराज चौहान के दरबार में पहुँचे, जहाँ उन्हें उनकी चूड़ासमा- वंशावली के कारण सम्मानजनक स्थान प्राप्त हुआ।

आगे चलकर खेतसिंह ने बुन्देलखण्ड में गढ़ कुण्डार को राजधानी बनाकर एक स्वतन्त्र खंगार राज्य की स्थापना की। उनके वंशजों ने लगभग दो सौ वर्षों तक इस क्षेत्र पर शासन किया। उन्हीं के वंशज आज के खंगार क्षत्रिय समाज के पूर्वज हैं।

खंगार क्षत्रिय वंशावली (संक्षेप में):

भगवान श्रीकृष्ण ( कुल, चन्द्रवंश)

→ वंश की शाखाएँ

→ चूड़ासमा राजवंश (जूनागढ़, सौराष्ट्र)

→ रा' खेंगार द्वितीय

→ रा' नोघन तृतीय

→ रा' कावट द्वितीय + रानी किशोर कुँवर बाई

→ महाराजा खेतसिंह खंगार (जन्म 1140 ई., गढ़ कुण्डार के संस्थापक)

→ खंगार राजवंश (बुन्देलखण्ड)

→ आज का खंगार क्षत्रिय समाज

प्रमाणिकता के स्रोत

खंगार क्षत्रियों की चन्द्रवंशी-चूड़ासमा उत्पत्ति की पुष्टि अनेक स्रोतों से होती है। पृथ्वीराज रासो (चन्द बरदाई) में खेतसिंह का उल्लेख पृथ्वीराज चौहान के विश्वसनीय सेनापति और उच्चकुलीन योद्धा के रूप में मिलता है। आल्हा खण्ड (जगनिक) में खेतसिंह की बुन्देलखण्ड विजय का वर्णन है। चूड़ासमा राजवंश की प्रमाणित वंशावली में रा' कावट द्वितीय का शासनकाल 1140–1152 ई. अंकित है, जो खेतसिंह की जन्मतिथि (1140 ई.) से पूर्णतः मेल खाता है। खंगार समुदाय के वहीवंचा भाट-अभिलेखों में यह सम्पूर्ण वंशावली आठ शताब्दियों से सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त, "बुन्देलखण्ड में खंगार राज्य" (राम औतार सिंह खंगार) पुस्तक में इस इतिहास का विस्तृत प्रलेखन उपलब्ध है।

यह वंशावली किसी कल्पना पर आधारित नहीं है — यह ऐतिहासिक तिथियों, स्थापित राजवंशीय सूचियों, और शताब्दियों पुरानी भाट-परम्पराओं पर टिकी हुई एक प्रामाणिक क्षत्रिय वंश-परम्परा है।

चित्र दीर्घा

खंगार क्षत्रिय: चन्द्रवंशी क्षत्रियों की गौरवशाली वंश परम्परा
खंगार क्षत्रिय: चन्द्रवंशी क्षत्रियों की गौरवशाली वंश परम्परा

स्रोत एवं संदर्भ

1. पृथ्वीराज रासो — चन्द बरदाई
2. आल्हा खण्ड — जगनिक
3. चूड़ासमा राजवंश वंशावली — Wikipedia: Legendary and early kings of Chudasama dynasty
4. बुन्देलखण्ड में खंगार राज्य — राम औतार सिंह खंगार
5. खंगार समुदाय वहीवंचा भाट अभिलेख
6. Khangar (community) — Wikipedia
7. History of Chudasamas — indianrajputs.com
अस्वीकरण: यह सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों से संकलित है और केवल शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्य से प्रस्तुत है। पूर्ण सटीकता की गारंटी नहीं दी जाती।
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