प्राचीन काल / चूड़ासमा राजवंश से सम्बन्ध

जूनागढ़ के चूड़ासमा: खंगार क्षत्रियों का मूल राजवंश

The Chudasamas of Junagadh: The Parent Dynasty of Khangar Kshatriyas

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सौराष्ट्र के उपरकोट दुर्ग से बुन्देलखण्ड के गढ़ कुण्डार तक — चूड़ासमा राजवंश के शौर्य, बलिदान और राजसत्ता की गाथा, जिनसे खंगार क्षत्रिय समाज की उत्पत्ति हुई।

खंगार क्षत्रिय समाज की जड़ें जूनागढ़ (सौराष्ट्र, गुजरात) के चूड़ासमा राजवंश में हैं। चूड़ासमा राजवंश को समझे बिना खंगार इतिहास को नहीं समझा जा सकता। यह लेख चूड़ासमा वंश की गौरवगाथा और उसके खंगार वंश से सीधे सम्बन्ध को प्रस्तुत करता है।

चूड़ासमा राज्य: सौराष्ट्र का गढ़

चूड़ासमा वंश ने लगभग छह सौ वर्षों तक (नवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी) सौराष्ट्र प्रायद्वीप पर शासन किया। उनकी राजधानी जूनागढ़ थी और उनका प्रमुख दुर्ग उपरकोट था — जो भारत के सबसे प्राचीन किलों में से एक माना जाता है।

चूड़ासमा अपनी वंशावली चन्द्रवंशी से जोड़ते थे। वे स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के वंशज मानते थे। यही वंशावली खंगार क्षत्रिय समाज की भी है।

चूड़ासमा इतिहास के स्वर्णिम अध्याय

रा' खेंगार द्वितीय का अमर शौर्य (1098–1125 ई.)

रा' खेंगार द्वितीय चूड़ासमा इतिहास के सबसे प्रतापी राजा थे। उनके शासनकाल में चूड़ासमा शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। गुजरात की लोक-परम्पराओं और रासमाला ग्रन्थ के अनुसार, रा' खेंगार ने रणकदेवी नामक राजकुमारी से विवाह किया, जो पाटन के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की मंगेतर थीं। इस कारण सिद्धराज ने जूनागढ़ पर आक्रमण किया।

रा' खेंगार ने अपनी सेना के साथ उपरकोट दुर्ग से भीषण प्रतिरोध किया। किन्तु उनके अपने ही भतीजों ने विश्वासघात करके शत्रु को किले में प्रवेश दिलाया। रा' खेंगार ने अन्तिम श्वास तक युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। रणकदेवी ने वढवाण में सती का अनुष्ठान किया। यह घटना गुजरात की सबसे प्रसिद्ध वीरगाथाओं में गिनी जाती है।

रा' खेंगार द्वितीय खंगार क्षत्रियों के प्रपितामह (great-grandfather) हैं। उनका शौर्य खंगार रक्त में आज भी प्रवाहित होता है।

रा' नोघन तृतीय: पुनर्स्थापक (1125–1140 ई.)

रा' खेंगार की शहादत के बाद चूड़ासमा राज्य बिखर गया। सोलंकियों ने जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। किन्तु चूड़ासमा वंश ने हार नहीं मानी। रा' नोघन तृतीय ने चूड़ासमा सत्ता को पुनर्स्थापित किया और जूनागढ़ की गद्दी पर पुनः चूड़ासमा ध्वज फहराया। उन्होंने 1125 से 1140 ई. तक शासन किया।

रा' नोघन तृतीय खंगार क्षत्रियों के पितामह हैं।

रा' कावट द्वितीय: खेतसिंह के पिता (1140–1152 ई.)

रा' नोघन तृतीय के बाद जूनागढ़ का सिंहासन रा' कावट द्वितीय को प्राप्त हुआ। खंगार समुदाय के वहीवंचा (भाट-वंशावलीकार) अभिलेखों में उनका नाम "राजा कटव-2" के रूप में सुरक्षित है — "कावट" से "कटव" का अन्तर गुजराती से बुन्देली बोली में ध्वनिगत परिवर्तन के कारण है।

रा' कावट द्वितीय के शासनकाल के आरम्भ में, विक्रम सम्वत् 1197, पौष मास, शुक्ल पक्ष (27 दिसम्बर, 1140 ई.) को उनके पुत्र खेतसिंह का जन्म हुआ — जो आगे चलकर खंगार राजवंश के संस्थापक बने।

रा' कावट द्वितीय की मृत्यु 1152 ई. में हुई, जब खेतसिंह मात्र 12 वर्ष के थे। जूनागढ़ का सिंहासन रा' जयसिंह (ग्रहरिपु द्वितीय) को प्राप्त हुआ।

रा' कावट द्वितीय + रानी किशोर कुँवर बाई — ये खंगार क्षत्रियों के मूल पितामाता हैं।

सौराष्ट्र से बुन्देलखण्ड: खंगार प्रवास

जूनागढ़ का सिंहासन न मिलने के बाद, युवा खेतसिंह ने राजपूत परम्परा के अनुसार अपनी तलवार से नया राज्य बनाने का संकल्प लिया। वे सौराष्ट्र से मालवा और राजस्थान होते हुए अजमेर पहुँचे, जहाँ पृथ्वीराज चौहान ने उनकी चूड़ासमा- वंशावली का सम्मान करते हुए उन्हें अपना विश्वसनीय सेनापति बनाया।

1182 ई. में महोबा की विजय के बाद पृथ्वीराज ने खेतसिंह को बुन्देलखण्ड का शासक नियुक्त किया। 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद जब चौहान साम्राज्य का पतन हुआ, तो खेतसिंह ने गढ़ कुण्डार से स्वतन्त्र खंगार राज्य की स्थापना की।

इस प्रकार, चूड़ासमा रक्त सौराष्ट्र के तट से चलकर बुन्देलखण्ड की विन्ध्य पर्वतमाला तक पहुँचा। जूनागढ़ के उपरकोट से गढ़ कुण्डार के शिखर तक — यह एक ही वंश, एक ही रक्त, एक ही क्षत्रिय परम्परा है।

गजानन माता: चूड़ासमा सम्बन्ध का जीवित प्रमाण

महाराजा खेतसिंह ने गढ़ कुण्डार दुर्ग में गजानन माता (चण्डिका भवानी) का मन्दिर स्थापित किया। गजानन माता खंगार क्षत्रियों की कुलदेवी हैं। सौराष्ट्र में माता के विशिष्ट रूपों की उपासना (जैसे खोडियार माता, आशापुरा माता) की गहरी परम्परा है। गजानन माता की पूजा का बुन्देलखण्ड में स्थानान्तरण इस बात का सबसे शक्तिशाली प्रमाण है कि खंगार क्षत्रिय सौराष्ट्र के चूड़ासमा राजवंश से आए। जो देवी गुजरात के तट पर पूजी जाती थी, वही देवी आज बुन्देलखण्ड के गढ़ कुण्डार में विराजमान हैं — यह कोई संयोग नहीं, यह वंश-प्रवाह का जीवित साक्ष्य है।

स्रोत एवं संदर्भ

1. रासमाला — अलेक्जेंडर किन्लोक फोर्ब्स
2. चूड़ासमा राजवंश वंशावली — Wikipedia: Legendary and early kings of Chudasama dynasty
3. History of Chudasamas: Rajput Provinces of India — indianrajputs.com
4. Kavat (king) — Wikipedia
5. खंगार समुदाय वहीवंचा भाट अभिलेख
6. बुन्देलखण्ड में खंगार राज्य — राम औतार सिंह खंगार
7. गढ़ कुण्डार — Wikipedia
8. चण्डिका भवानी गजानन माता मन्दिर — YouTube documentation
अस्वीकरण: यह सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों से संकलित है और केवल शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उद्देश्य से प्रस्तुत है। पूर्ण सटीकता की गारंटी नहीं दी जाती।
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